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सप्ताह का संदेश - Word For The Week

"सप्ताह का संदेश" - यह पत्रिका प्रतिएक सप्ताह प्रकाशित एवं वितरित की जाती है | प्रतिएक लेख/अंश, भाई जेक पुनन द्वारा लिखे लेखों /पुस्तकों एवं उपदेशों का अंश है
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परमेश्वर के समय की प्रि तक्षा करें
जुलाई 2012 (5) - जैक पूनन

2 शमूएल 2:1 में हम पढ़ते हैं कि दाऊद ने परमेश्वर की अनुमति ली है। 1 शमूएल 23:2-4 तथा 30:8 में हम देखते है कि दाऊद ने हर बार निर्णय लेते समय परमेश्वर की अनुमति ली है तथा परमेश्वर की इच्छा को जाना है। 2 शमूएल 5:17-25 में हम पढ़ते हैं कि 2 बार पलिश्तियों के विरुद्ध युद्ध करते समय दाऊद ने परमेश्वर की इच्छा को जाना। दूसरे युद्ध के समय परमेश्वर ने षड़यंत्र को बदल दिया। परमेश्वर ने कहा कि शत्रु पर पीछे से हल्ला करे। हर बार परमेश्वर ने रणनीति को बदल दिया है। दाऊद युद्ध में कुशल था। फिर भी उसने परमेश्वर से रणनीति पूछी और इस कारण वह हर बार विजयी हुआ। जब उस प्रांत में अकाल पड़ा तब दाऊद ने परमेश्वर से अकाल का कारण पूछा (2 शमूएल 21:1)।

कुछ बातों में दाऊद ने परमेश्वर की इच्छा को नहीं जाना था। उनमें से तीन उदाहरण इसप्रकार है : (1) दाऊद ने छह स्त्रियों से विवाह किया तब उसने परमेश्वर की इच्छा को नहीं जाना (2 शमूएल 3)। (2) दाऊद ने बतशेबा को महल में बुलाया तब उसने परमेश्वर की इच्छा को नहीं जाना (2 शमूएल 11)। (3) दाऊद ने इस्राएल की सिरगिनती की तब उसने परमेश्वर की इच्छा को नहीं जाना (2 शमूएल 24)। जब जब उसने परमेश्वर के निर्देश के अनुसार किया तब तब वह सही मार्ग पर चलता गया। यह हमारे लिये एक सीख तथा चेतावनी है।

दाऊद परमेश्वर के मन के अनुसार व्यक्ति था, फिर भी उसने गलतियां की तथा असफल हुआ। बाइबिल में हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर के कई सेवकों ने गलतियां की तथा असफल हुए। उनके सफलता से जितनी हमें सीख मिलती है उतनी ही उनके असफलता की कहानियों को पढ़कर भी सीख मिलती है। वे भी कई बार असफल हुए और हम भी होते है। हमें सीख मिलती है कि जो गलती करते है तथा असफल होते है उन्हें भी परमेश्वर उपयोग में लाता है। जब हम युवा होते है तब हम मूर्खतासे गलतियां करते है तथा असफल होते है। उन दिनों में हममें जोश होता है परन्तु ज्ञान की कमी होती है। जवानी के दिनों में हम मूर्खता से कई बातें करते है और कहते है। परन्तु परमेश्वर दयालू है। हम जैसे असफल व्यक्तियों को वह चुनता है और अपने मन के अनुसार बनाता है।

यहूदा के लोग आए तथा उन्होंने यहूदा पर राजा होने के लिये दाऊद को अभिषेक किया। उसके बाद दाऊद को संपूर्ण इस्राएल पर राजा होने के लिये अभिषेक किया गया (5:3-5)। जब वह यहूदा का राजा हुआ तब उसकी आयु 30 वर्ष की थी। इस्राएल पर राजा होने से पूर्व उसे साड़े सात वर्ष प्रतिक्षा करनी पड़ी। परमेश्वर का अभिवचन पूरा होने के लिये उसे कुल मिलाकर 20 वर्ष प्रतिक्षा करनी पड़ी। उसका प्रतिक्षा काल तथा इब्राहीम का प्रतिक्षा काल एक सा है। दाऊद ने धीरज के साथ प्रतिक्षा की। हम उन लोगों का अनुसरण करें जिन्होंने परमेश्वर का अभिवचन पूरा होने के लिये विश्वास के साथ प्रतिक्षा की है। दाऊद ने स्वयं के लिये राजपद को नहीं छिना। उसने परमेश्वर के समय के लिये प्रतिक्षा की। यदि उसने बतशेबा को न छिना होता तो परिणाम कुछ और होता।

यदि आप परमेश्वर के मन के अनुसार होना चाहते हो तो आपमें छिनने की आदत न हो। याकूब छिनने वाला व्यक्ति था और जब तक वह वैसा था तब तक वह इस्राएल नहीं बन पाया। बच्चे इस संसार में मुट्ठी बन्द करके पैदा होते है। जब हम उनके मुट्ठी में उंगली डालते हैं तब वे हमारी उंगली जोर से पकड़ लेते है, मानो वे हमारी उंगली छीन रहे हो। जब वे थोड़े बड़े हो जाते है तब खिलौने छिनने की कोशिश करते है। छिनना यह मानवीय स्वभाव है। हम अपने जीवनकाल में स्वयँ के लिये अधिकार, पैसा तथा आदर छिनते है। परन्तु यीशु का स्वभाव ऐसा नहीं था। उसने स्वयँ के लिये कुछ नहीं छिना। उसकी मुट्ठी बन्द नहीं थी। उसके हाथ सदा लोगों के लिये खुले होते थे। क्रूस पर उसने अपने हांथों को खुला रखकर लहू बहा दिया। हम यीशु का अनुसरण करे। हम हमारे हक और अधिकार औरों को दे। परमेश्वर हमें बहुतायतसे आशीषित करेगा। परमेश्वर स्वयँ हमें सेवकाई, अधिकार तथा जो आवश्यक है वह सब देगा। हमें केवल उसके समय की प्रतिक्षा करनी होगी। स्वयँ छिनने से अच्छा है कि हम परमेश्वर से सबकुछ प्राप्त करे। याकूब को आवश्यकता नहीं थी कि वह अपने पिता से धोखाधड़ी करके अधिकार छीन ले। यदि याकूब ने प्रतिक्षा की होती तो परमेश्वर ने उसे दाऊद के नाई सबकुछ दिया होता। जब जब हम कुछ छिनते है तब हम हमारे अविश्वास को दर्शाते है।

यदि हम किसी स्त्री की ओर आकर्षित होकर उससे विवाह करना चाहते है तब हम सोचते है, ''यदि मैं उसे जल्दी नहीं छिन लूं तो वह किसी और की हो जाएगी।'' यह अविश्वास है। यदि हम परमेश्वर पर भरोसा करेंगे तो हम धीरज बरतेंगे और कुछ नहीं छिनेंगे। हम विश्वास से कहेंगे, ''प्रभु तुने मेरे लिये जो रखा है वह तू मुझे अवश्य देगा। जिस व्यक्ति को तुने मेरे लिये रखा है उससे कोई भी शादी नहीं करेगा।'' जो सेवकाई परमेश्वर ने आपके लिये रखी है उसे भी यही तत्व लागू होता है। हमारी सेवकाई कोई और नहीं छिन सकता। यदि हम परमेश्वर की प्रतिक्षा करेंगे तो वह हमें उचित सेवकाई देगा।

परमेश्वर पर भरोसा करना सीखे तथा किसी बात की शिकायत न करे। यदि परमेश्वर चाहता है कि हम 20 वर्ष तक प्रतिक्षा करे तो हम वैसा करेंगे। 20 वर्ष के अंत में हम एक सिद्ध अगुवे होंगे। हम देखते हैं कि शाऊल और सुलैमान किसी बात के लिये प्रतिक्षा करना नहीं सीखे। जीवन में उनके पास सभी सुविधा होने के कारण उन्होंने दुःख और तनाव का अनुभव नहीं किया। जिसके जीवन में सभी सुविधाएं है उसपर मुझे तरस आता है क्योंकि उसे दुःख और तनाव सहने का अनुभव प्राप्त नहीं होगा। जिसे लोगों ने ठुकराया है उसे परमेश्वर बड़ी सेवकाई देगा।

अनुवादक : विनोद टॊडॆ     मुद्रक प्रारूप    इसे भेजें
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