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मसीह की कलीसिया में किसी व्यक्ति के बिना कार्य नहीं होगा ऐसा नहीं है। यदि हम नहीं भी रहे तौभी परमेश्वर का कार्य चलता ही रहेगा। जो लोग स्वयँ को विशेष समझते है उनकी गैरमौजुदगी में परमेश्वर का कार्य अच्छी रीति से चलता हैं। यह बात हमें सदैव ध्यान में रखनी चाहिए। जो लोग स्वयँ को विशेष समझते है उनके दीन होने के विषय में एक लेख मैंने पढा। उसमें लिखा हुआ था, ''ऐसे व्यक्ति को बालटीभर पानी में हाथ डालने को कहे। फिर उन्हें हाथ निकालने को कहे। उनका हाथ निकालने पर जो खाली जगह वहां बनती है वह उनकी गैरमौजुदगी से बनती है। आपके
दान तथा गुण कलीसिया के लिये महत्वपूर्ण है परन्तु आपके बगैर काम रूकता नहीं।
जब भी परमेश्वर की बुलाहट होगी तब हमारी जिम्मेदारियाँ उसे देने के लिये हम तैयार रहे। स्वकेंद्रित मसीही कर्मचारी इसे मान्य नही करेगा। स्वकेंद्रित अधिकारी अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहते। लम्बे समय तक वे उसे धरे रहते है। बहुतसे मसीही अगुवे अपनी राजगद्दीपर बैठकर सड़ रहे
है। वे परमेश्वर के कार्य में रूकावट बने हुए है। अपना स्थान या अपनी जिम्मेदारीयां सौंपना कितना महत्वपूर्ण है यह वे नहीं जानते।
उत्तराधिकारी के बिना सफलता असफल है। यीशु को इस बात का पूर्ण एहसास था कि उसका कार्य आगे चलने के लिये उसने लोगों को प्रशिक्षीत किया है। साड़े तीन वर्ष के समय में यीशुने उसके शिष्यों को सेवकाई के लिये तैयार किया था। यीशु ने उन्हें अगुवाई की शिक्षा दी। हमारे लिये यह
कितना अच्छा उदाहरण है।
पौलुस का कार्य आगे शुरू रहने के लिये उसने अन्य लोगों को प्रशिक्षीत किया। 2 तीमुथियुस 2:2 मं् पौलुस तीमुथियुस से कहता है, ''और जो बातें तू ने बहुत गवाहों के सामने मुझ से सुनी हैं, उन्हें विश्वासी मनुष्यों को सौंप दे, जो औरों को भी सिखाने के योग्य हों।'' पौलुस ऐसा कह रहा है, ''यह
संपत्ती तू औरों को सौंप दे। जवानों को आगे आने के लिये रूकावट न कर।'' उद्योजकों को भी यह तत्व मालूम है कि उत्तराधिकारी के बिना सफलता असफल है। बहुत से मसीही अगुवों को यह बात समझी नहीं है। ''क्योंकि इस संसार के लोग अपने समय के लोगों के साथ रीति व्यवहारों
में ज्योति के लोगों से अधिक चतुर हैं'' (लूका 16:8)।
जवानों ने किया हुआ अच्छा कार्य स्वार्थी मनुष्य को अच्छा नहीं लगता क्योंकि उसके मन में इर्ष्या होती है। परमेश्वर ने हाबिल की भेट को स्वीकार किया तथा कैन की भेट को स्वीकार नहीं किया। इसकारण कैन के मन में इर्ष्या उत्पन्न हुई। यदि हाबिल बड़ा होता और कैन छोटा होता तो शायद
कैन के मन में इर्ष्या उत्पन्न न होती। परन्तु छोटे भाई के द्वारा अच्छा कार्य होने के कारण कैन के मन में इर्ष्या उत्पन्न हुई।
युसूफ तथा उसके दस भाईयों की कहानी में भी हम इस तरह की इर्ष्या देखते है। युसूफ को दैवी प्रकाशन हुआ। इसकारण उसके दस बड़े भाईयों के मन में इर्ष्या उत्पन्न हुई। और वे युसूफ को मारना चाह रहे थे।
शाऊल राजा के मन में इर्ष्या उत्पन्न हुई क्योंकि उससे कम आयुवाले दाऊद के लिये स्त्रियों ने जयजयकार का गीत गाया। स्त्रियों ने शाऊल राजा के लिये गीत गाया परन्तु दाऊद के लिये और अधिककर उसे ऊँचा उठाने के लिये गीत गाया। उसी दिन से शाऊल राजा दाऊद को खत्म करना
चाह रहा था। मनुष्यों के इतिहास में तथा कलीसिया के इतिहास में इर्ष्या की अनेक कहानियाँ हमें पढ़ने को मिलती है।
उसी तरह यीशु से आयु में बड़े फरीसियों के मन में इर्ष्या उत्पन्न हुई क्योंकि यीशु सभी तरफ प्रसिद्ध हुआ। इस कारण फरीसी उसे क्रूस पर चढ़ाने की पूरी कोशिश कर रहे थे।
परन्तु, नये नियम में बरनबास की मनोवृत्ती हम इस परिस्थिति में अलग पाते है। वह पौलुस से वरिष्ठ था। जब पौलुस का परिवर्तन हुआ तब पौलुस को विश्वासियों ने अपनाया नहीं। परन्तु उसी समय बरनबास ने पौलुस को अपनाया। वह पौलुस को अंताकिया ले गया तथा उसे धीरज दिया। प्रेरितों के काम के 13 वें अध्याय में हम पढ़ते है कि बरनबास तथा पौलुस प्रचार की प्रथम यात्रा में गए। जब बरनबास ने जाना कि उससे छोटे पौलुस को परमेश्वर ने बड़ी सेवकाई के लिये बुलाया है तब बरनबास ने एक कदम पीछे लिया तथा पौलुस को सामने जाने दिया। प्रेरितों के काम ''बरनबास तथा पौलुस'' यह वाक्प्रचार बदलकर ''पौलुस तथा बरनबास'' हो गया। आज कलीसिया में बरनबास जैसी मनोवृत्ती न होने के कारण कलीसिया को सहना पड़ रहा है। आज बड़े लोग स्वयँ को पीछे करके जवानों को आगे नहीं करना चाहते। हम कम महत्वपूर्ण बातों में स्वयँ को पीछे करके दूसरों
को आगे करते हैं। यदि छोटे द्वार से जाना है तो हम औरों को आगे जाने देते हैं। परन्तु जब महत्वपूर्ण बातें - कलीसिया में अगुवापन, स्थान की बात आ जाए तो हम स्वयँ को पीछे नहीं करते, वरन औरों को पीछे करके स्वयँ को आगे करते है। हमारी स्वार्थी वृत्ती धोखाधड़ी करनेवाली है। कम महत्वपूर्ण बातों में स्वयँ को नम्र तथा लीन दिखाते हैं। परन्तु जब महत्वपूर्ण बात आ जाए तो हमारा वास्तविक स्वभाव प्रगट होता है।
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