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1. बुराई के विषय वास्तविक सत्य
संसार के महान रहस्यों में से एक जिसे लोगों ने समझने की अथक कोशिशों की वह है बुराई का रहस्य। वह संसार जिसे सर्वज्ञानि और भले परमेश्वर ने बनाया उस्में बुराई की शुरूवात कहाँ से हुई?
संसार के हर क्षेत्र में बुराई का वर्चस्व क्यों होता है? और सब जगह इतनी बीमारियाँ, गरीबी, दुख और क्लेश क्यों पाया जाता है? क्या परमेश्वर हामारी मदद करने में रूचि नहीं रखता? य़े ऐसे प्रश्न हैं जिनका हल खोजना है। और बाइबिल हमें उसका उत्तर देती है।
परंतु इससे पहले कि हम इस विषय में आगे ब़ढें, आइये हम परमेश्वर के विषय कुछ सच्चाइयों से अवगत हो जएं। परमेश्वर का अस्तित्व अनंतकाल से है। उसकी कोई शुरूवात नहीं है। जिसे हम समय या युग के नाम से जानते हैं वह उसकी भी सीमा के बहुत पहले से अस्तित्व में है। इस बात को समझ पाना हमरे लिये बहुत कठिन है। यह केवल इसलिये कि हमरे दिमाग परमेश्वर की बुद्धि को समझ ही नहीं सकता - ठीक उसी प्रकार जैसे एक कप अपने आप में समुद्र के जल को समा सकने में असमर्थ होता है।
बाईबल की पहली आयत इस प्रकार है:
"आदि में परमेश्वर...(उत्पत्ति 1:1)*
(*उत्पत्ति की पुस्तक बाईबिल की 66 पुस्तकों मे से पहली पुस्तक है। कोष्टक में दिये गये सभी संदर्भ बाईबिल की पुस्तको में से किसी न किसी पुस्तक से संबंधित हैं। बाईबिल, परमेश्वर अनंतकालीन अस्तित्प का है सिद्ध करने की कोई कोशिश नहीं करती। वह इस बात को सत्य घोषित करती है। बाईबिल में परमेश्वर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है जो हमारे साथ व्यक्तिगत् संबंध रखने की इच्छा रखता है। वह एक मनुष्य नहीं है जैसा हम एक व्यक्ति को समझ्ते हैं। वह एक आत्मा है, हर द्रष्टिकोण से अनंत और स्वभाव से कभी न बदलने वाला। वह सर्वशक्तिमान सर्वज्ञानी, अनादिकाल से बुद्धिमान, अनादिकाल से प्रेमि, अनादिकाल से पवित्र है।
स्वर्गदूतों में उनका अगुवा होने के लिये लूसिफ़र को ब्नाया। वह नाम जो आज दुष्टता का प्रतीक है, किसी समय स्वर्गदूतों में सबसे बुद्धिमान और सबसे सुंदर के नाम से जाना जाता थ। वह प्रधान स्वर्गदूत था।
परमेश्वर ने लूसिफ़र के विषय कहा: "तू तो उत्तम से भी उत्तम है, तू बुद्धि से भरपूर और सर्वांग सुंदर है। तू परमेश्वर की अदन नामक बारि में था, तेरे पास आभूषण, मणिक, पद्यराग, हीरा, फ़ीरोज़ा, सुलैमानी मणि, यशभ, नीलमणि, मरकद, और लाल सब भांति के मणि और सोने के पहरावे थे, तेरे डफ़ और बांसुलियां तुझी में बनाई गई थी, जिस दिन तू सिरजा गया था, उस दिन वे भी तैयार की गई थीं। तू छानेवाला अभिषिक्त करूब था, मैंने तुझे ऐसा ठहराया कि तू परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर रहता था, तू आग सरीखे चमकने वाले मनियों के बीच चलता फ़िरता थ्ज्ञा। जिस दिन से तू सिरजा गया, और जिस दिन तक तुझ मे कुटिलता न पाई गई, उस समय तक तू अपनी सारी चालचलन में निर्दोष रहा" (यहजकेल 28:12-15)।
परमेश्वर ने जो तारे और पे़ड बनाए, उनसे हटकर लूसिफ़र और अन्य दूतों को परमेश्वर की आज्ञापालन करने या न करने के चुनाव की छूट थी। एक व्यक्ति को सदाचारी होने के लिये उसकी स्वेच्छा प्रथम आवश्यक बात है।
तारे और पे़ड भला या बुरा नहीं कर सकते क्योंकि उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। वे निर्विवाद परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं क्योंकि वे चुनाव की स्वतंत्रता रहित स्रजे गये हैं। इसलिये वे किसी भी पहलू से परमेश्वर के पुत्र नहीं हो सकते। एक वैज्ञानिक द्वारा बनाया गया रोबोट उसे बनाए गए प्रोग्राम के अनुसार उसकी हर आज्ञा का पालन करेगा, परंतू उसका बेटा ऐसा नहीं करेगा। फ़िर भी रोबोट उस वैज्ञानिक का बेटा नहीं बन सकता। एक व्यक्ति को सदाचरी होने के लिये उसे भले-बुरे का ज्ञानी होना दूसरी आवश्यकता है। पक्षी और जानवर स्वेच्छा से कार्य करने का चुनाव कर सकते हैं। परंतू वे सदाचारी नहीं है क्योंकि उन्हें भले-बुरे का ज्ञान नहीं होता। इसलिये वे न पवित्र और न ही पापी होते हैं। इसलिये वे परमेश्वर की संतान नहीं होते क्योंकि परमेश्वर एक सदाचरी व्यक्तित्व है।
वास्तत्व में पक्षी और जानवर किसी भी हाल में आपके संतान नहीं हो सकते।
आप एक कुत्ते को आपका आज्ञाकारी होने का प्रशिक्षण दे सकते हैं। परंतु फ़िर भी आप का बेटा नहीं बन सकता क्योंकि आपके बेटे में आपका स्वभाव होना जरूरी है - और यह बात कुत्ते में है ही नहीं।
परंतु परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया। यही बात हमें उसकी संताना बनने में संभब बनाती है। विवेक हमरे भीतर वह आवाज़ है जो हमें सदाचारी होने की याद दिलाता है और जब हम परमेश्वर के नियमों क उल्लधंन करते हैं तब वह हमें दोषी ठहराता है। दूतों को स्वेच्छाबलि और विवेक के सात स्रजा गया था। इस प्रकार वे परमेश्वर के द्वरा स्रष्टि किये जाने के समय कुछ भिन्न थे क्योंकि वे सूझ-बूझ रखने वाले सदाचारी थे। फ़िर भी अगुवे लूसिफ़र के ह्र्दय में ऐसे विचार और जिज्ञासाएं उठने लगे जो अच्छे नहीं थे। यही वह समय था जब इस संसार में बुराई की शुरुवात हुई। लूसिफ़र के केवल विचार ही बुरे नहीं थे परंतु उसके विचार घमंड, विद्रोह और असंतोष से परिपूर्ण थे। जब तक लूसिफ़र में बुरे विचार नहीं आए तब तक यह संसार पूर्णत: पवित्र था। परंतु अब बुराई ने स्रजे हुए मनुष्य के भीतर जिसे भले-बुरे का ज्ञान है, अपना विक्रत सिर उठा लिया है।
याद रखें कि बुराई की शुरूवात ह्र्दय से हुई। यह बाहर्य प्रक्रियाओ से नहीं आई। आज भी, बुराई का जन्म ह्रदय से ही होता है। यह भी याद रखें कि सबसे पहला पाप जिससे सारे संसार में बुराई फ़ैल गई वह घमंड ही था। परमेश्वर ने लूसिफ़र को उसकी उपस्थिति से हटा दिया। और उसी समय से लूसिफ़र शैतान कहलाया गया। बाईबिल शैतान के पतन का वर्णन इस प्रकार करती है: "हे भोर के चमकने वाले तारे तू कैसे आकाश से गिर प़डा है। तू जो जाति जाति कॊ हरा देता था, तू अब कैसे काटकर भूमि पर गिराया है? तू मन में कहता तो था, ’मैं स्वर्ग पर चडूंगा, मैं अपने सिंहासन को ईश्वर के तारागण से अधिक ऊंचा करूंगा; और उत्त्र दिशा की छोर पर सभा के पर्वत पर विराजूंगा।’ मैं मेघों से भी ऊंचे स्थानों के ऊपर चढूंगा, मैं परमप्रधान के तुल्य हो जाऊंगा। परंतु तू अथोलोक में उस गडहे की तह तक उतारा जाएगा" (यशायाह 14:12-14)। परंतु जब तक लूसिफ़र गिराया जाता वह उसके विद्रोह में कुछ अन्य दूतों को भी शामिल करने में सफ़ल हो गया। लाखों दूत उसके साथ शामिल हो गए - अर्थात स्वर्ग के
1 तिहाई दूत (जैसा हम प्रकाशितवाक्य 12:4 में प़ढते हैं)। इसलिये परमेश्वर ने लूसिफ़र के साथ उन्हें भी गिरा दिया। गिराए हुए यही दूत दुष्ट आत्माएं (दानव) हैं जो आज लोगों को सताते और तकलीफ़ देते हैं।
शायद आप भी दुष्ट आत्माओं या दूसरे जादू-टोना करने वालों द्वारा सताए गए हों। यदि ऐसा हुआ है तो बाईबिल में आपके लिये शुभ संदेश है। आप उनके सताव से हमेशा के लिये पूर्णत: स्वतंत्र हो सकते हैं।
इस पुस्तक को ध्यान से प़ढे और जब आप इसके अंत में पहुचेंगे तब आप समझ पाएंगे कि परमेश्वर आपके लिये कैसे चमत्कार कर सकता है।
कुछ लोग यह पूछ सकते है कि "यदि संसार में बुराईयों की सारी ज़ड शैतान ही है तो परमेश्वर शैतान और अन्य दुष्टात्माओ को ही नष्ट क्यों नहीं कर देता?" यदि परमेश्वर चाहे तो निश्चित रूप से एक क्षण में एसा कर सकता है। परंतु वह ऐसा नहीं करता। यह इस बात कि पुष्टि करता है कि शैतान और दुष्टात्माओ के अस्तित्व में बने रहने देने में सर्वज्ञानी परमेश्वर का एक उद्देश्य है। उसके उद्देश्य का एक भाग यह है कि वह शैतान द्वारा प्रथ्वी पर मनुष्य के जीवन को जटिल, असुरक्षित, खतरनाक बनाना चाहता है ताकि मनुष्य संसार में सुख-सुविधाओं में ध्यान न लगाकर परमेश्वर की और अनंत जीव न के विषय सोचें।
यदि प्रथ्वी पर जीवन अत्यंत आरामदायक होता जहाँ कोई बीमारी, क्लेश, गरीबी, आपदाएं आदि न होते तो शायद ही कोई परमेश्वर का विचार करता। इसलिये परमेश्वर इन सभी आपदाएं और असुरक्षाओं के उपयोग द्वारा हमें उसके विषय सोचने और जरूरत में उसकी ओर फ़िरने के लिये करता है।
यहाँ तक कि जो समस्याएं बीमारियाँ और परिक्षाएं शैतान आपके जीवन में लाता है वे भी प्रेमी परमेश्वर की अनुमति से ही अते हैं ताकि आप जीवन में लाता है वे भी प्रेमी परमेश्वर की अनुमति से ही आते हैं ताकि आप परमेश्वर के प्रेम का दर्शाता है। यह बाईबिल का संदेश है।
मैंने एक व्यापारी के विषय सुना जो किसी समय परमेश्वर के निकट था। जैसे ही उस्का व्यव्साय ब़ढा वह परमेश्वर से दूर हो गया। उसके चर्च के बुजुर्गों ने उससे बार-बार इस विषय बात की और उसे परमेश्वर के ओर लौटा लाने के प्रयत्न भी किये। परंतु वह अपने व्यवसाय मेंही अत्याधिक व्यस्त रहा। एक दिन उसके तीन बेटो में से सबसे छोटे बेटे को जहरीले सांप ने काट लिया और बच्चा गंभीर रीति से बीमार हो गया। यहाँ तक कि डाँक्टरों ने भी उसके बचने की उम्मीद छो़ड दिये। तब उस बच्चे का पिता सचमुच ब़डा चिंतित हो गया और चर्च के एक बुजुर्ग को बच्चे के लिये प्रार्थना करने को बुलवा भेजा। वह बुजुर्ग एक समझदार व्यक्ति था। उसने आकर यह प्रार्थना किया, "परमेश्वर इस बच्चे को काटने के लिये सांप को भेजने के लिये धन्यवाद - क्योंकि आपके बारे सोचने के लिये मैं इस परिवार को कभी तैयार नहीं कर पाता। परंतु 6 वर्ष में भी में जो नही कर पाया वह इस सांप ने एक क्षण में कर दिया! अब जब कि आपके विषय याद दिलाने के लिये उन्हें कभी किसी सांप की जरूरत न प़डे।"
कुछ लॊग ऐसे हैं जो कभी परमेश्वर के बारे में सोचते ही नही है तब तक जब तक कि वे अचानक एक दिन कैंसर या किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होकर अस्प्ताल नहीं पहुंच जाते। तब वे परमेश्वर के विषय सोचते और उद्धार के लिये उस्की ओर फ़िरते हैं। कभी न सुधराने वाले रोग, बिमारियां, गरीबी और संसार की कई बुराईयां मनुष्य को पाप से फ़ेर लाने के लिये परमेश्वर उपयोग में लाता है। इस प्रकार परमेश्वर उन्हें स्वर्ग में अनंतकाल के निवासों तक पहुंचने में सहायता करता है। शैतान द्वारा किये जाने वाली बुराईयों का उपयोग करके लोगों को शैतान के ही शिकंजों से छु़डाकर उन्हें अनंतकालीन उद्धार दिलाने का परमेश्वर का यही तरीका है।
इस प्रकार परमेश्वर शैतान को बार-बार मूर्ख बनाता है।
जो गढ्ढा शैतान दूसरों के लिये खोदता है वह स्वयं उसी में ढकेला जाता है।
शैतान का अस्तित्व बने रहने का दूसरा कारण है परमेश्वर की संतानों को पवित्र बनाना।
आग के उदाहरण को देखें। संसार के इतिहास में लाखों लोग आग में झुलसकर मर गये। फ़िर भी इसके कारण आग का उप्योग करना कोई बंद नहीं कर देता। क्यों? वह इसलिये कि आग के ही द्वारा भोजन पकाया जाता है, गाड़ियां चलती है और विमान उ़ढाया जाता है और यंत्र चलाए जाते हैं। सोना भी आग में तपाकर शुद्ध किया जा सकता है। इसलिये आग भले ही नुकसानकारक और खतरनाक है, अच्छे कामों में उपयोग में लाई जा सकती है।
उसी प्रकार शैतान यद्यपि बुरा है और लोगों को गुमराह करता है फ़िर भी परमेश्वर उसका उपयोग करता है। शैतान को यह अनुमति है कि वह कई अग्निपरिक्षाओं और परेशानियों के जरिये परमेश्वर की संतानों की परिक्षा ले ताकि वे पवित्र और शुद्ध बने जैसे सोना आग में डालकर शुद्ध किया जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि परमेश्वर संसार की सारी बुराईयों को एक ही क्षण में खत्म कर सकता है, फ़िर भी वह ऐसा नहीं करता क्योंकि वह अपने महिमामय उद्धेश्यों को उन्हीं के माध्यम से पूरा करता है।
2. पाप के विषय वास्तविक सत्य कुछ लोग अक्सर जानवरों जैसा व्यवहार क्यों करते हैं?
उत्तर है: क्योंकि उनकी रुचि केवल उनके शारीरिक जरूरतों और प्रथ्वी पर उनके अस्तित्व में ही होती है।
एक जानवर की रूचि किन बातों में होती है? भोजन, नींद और लैंगिक समाधान। और जब एक मनुष्य भी केवल इन्हीं बातों में रूचि रखता है तब हम कह सकते हैं कि वह जानवर के स्तर तक गिर चुका है।
परंतु परमेश्वर ने मनुष्य के जानवर के समान रहने के लिये नहीं बनाया। उसने हमें उसकी समानता में बनाया - सदाचारी, धर्मी, चरित्रवान और सयंमी, और जानवरों सी भावनाओं के दासत्व से मुक्त।
जानवरों से अधिक समझदारी और शिक्षा हमें उनसे बेहतर नहीं बनाती। प़ढे लिखे शिक्षित और समझदार लोग भी लालच, स्वार्थीपन, लैंगिक अभिलाषा, क्रोध, आदि के गुलाम होते हैं।
हमारे अंगों में एक अंग है जो हमारे विचारों से भी ब़ढकर सक्षम है। वह है हमारी आत्मा जो हमें परमेश्वर के विषय सजय करती है। वह किसी जानवर में नहीं होती।
हमने देखा कि परमेश्वर ने हमें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की सामर्थ वाले सदाचारी व्यक्ति बनाया है। परंतु निर्णय लेने या चुनाव करने की स्वतंत्रता में यह खतरा भी है कि हम इस स्वतंत्रता का उपयोंग परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंधन के लिये कर सकते हैं। परंतु परमेश्वर ने यह जेखिम उठाया - क्योंकि वह ऐसी संतान चाहता था कि स्वयं उसके विषय निर्णय लेने वाले हों। संसार में सारी अव्यवस्था, बीमारियां और बुराईयां मनुष्य द्वारा परमेश्वर की आज्ञा उल्लंधन और शैतान के प्रति समर्पन का ही सीधा परिणाम है।
प्रथम पुरुष और स्त्री जिन्हें परमेश्वर ने बनया आदम और हव्वा कहलाए। जब वे स्रजे गये थे तब वे निर्दोष थे। पवित्र बने रहने के लिये उन्हें ही चुनाव करना था। और चुनाव करने के लिये उन्हें परीक्षा से गुजरना था ताकि वे बुराई का इंकार करें और केवल परमेश्वर को चुनें। इस्लिये परमेश्वर ने शैतान को उनके पास आने और उन्की परीक्षा लेने की अनुमती दिया। इस बात को हम बाइबिल की प्रथम पुस्तक उत्पत्ति दूसरे और तीसरे अध्यायों में प़ढ्ते है।
निर्दोषता और पवित्रता में काफ़ी अंतर है। निर्दोषता वह है जो हम एक शिशु कें देख्ते हैं। यदी आप जानना चाहते हैं की जब आदम सिरजा गया तब वह क्या था तो एक शिशु को देखें - जो निर्दोष, और जिसे भले और बुरे का ज्ञान न हो। परंतु वह बच्चा न पवित्र है न ही सिद्ध। सिद्ध होने के लिये उस शीशु को ब़ढना होगा और बुराईयों का इन्कार और परमेश्वर का चुनाव कर्ने के द्वारा कुछ निर्णय लेना होगा।
जब हम हमारे विचारों में परिक्षाओं में गिर्ने से इन्कार करते हैं तब हम चरित्र का निर्माण करते हैं। आज आप जो भी हैं वह आपके द्वारा जीवन में अब तक किये गये अच्छे चुनावों का वजह से हैं। यदि आपके इर्द-गिर्द के लोग आपसे बेह्तर है वह इस्लिये कि उन्होंने आपकी तुलना में बेह्तर चुनाव किया। हम सभी प्रतिदिन चुनाव करते हैं - और वे चुनाव ही निश्चित करते हैं कि हमें क्या बनना है।
जब परमेश्वर ने प्रथम पुरुष और स्त्री को बनाया उसने उन्हें शैतान द्वारा परखे जाकर पवित्र होने के लिये अदसर दिया। उस्ने उन्हें एक बाग में रखा और कहा कि वे एक छोडकर बाकी सभी व्रक्षों के फ़ल को खा सकते हैं।
यह एक परीक्षा थी - क्योंकि वे ऐसे बाग में रखे गये थे जहां लुभाने वाले कई फ़लों के व्रक्ष के छो़डकर सभी व्रक्ष के फ़ल खा सकते थे। परंतु वे आज्ञापालन की सामान्य परीक्षा में असफ़ल हो गये। वह इस्लिये हुआ क्योंकि शैतान ने हव्वा को यह कहकर बहका दिया कि यदि वे मना किये गये व्रक्ष के फ़ल को खा लें तो के भी परमेश्वर के तुल्य हो जाएंगे। उस समय आदम और हव्वा की परिक्षा केवल फ़ल खाने या न खाने की नहीं थी परंतु उन्के परमेश्वर के तुल्य होने के चुनाव की परिक्षा थी।
यही इच्छा किसी समय शैतान ने भी किया था। और इसी बात के लिये उसने आदाम और हव्वा को भी प्रेरित किया। यह सच है कि शैतान के उन्से जो कुछ कहा वह एक झूठ था - ठीक वैसा ही झूठ जैसा वह आज भी लोंगों को धोखा देने के लिये करता है। जैसा आज भी लोग शैतान के झूठ में फ़स जाते है वैसे ही आदम और हव्वा भी फ़स गये। उन्होंने परमेश्वर की उपस्थिति से निकले गये। इन सब बातों का विवरण बाईबिल की प्रथम पुस्तक में प़ढा सकता है (उत्पत्ति अध्याय 3)।
आदम और ह्व्वा ने सोचा कि परमेश्वर की आज्ञा उल्लंधन के द्वारा वे ठीक परमेश्वर मे ही समान सर्वसामर्थी सुर स्वतंत्र हो जाएंगे। परंतु क्या वे स्वतंत्र हो सके? नहीं। वे केवल शैतान के गुलाम होकर रह गये। केवल परमेश्वर की आज्ञापालन के द्वारा ही हम वास्तव में स्वतंत्र हो सकते हैं। इसी बात में शैतान बहुत से लोगों को गुमराह करता है। वह उनसे कहता है के यदि वे सचमुच जीवन का आनंन्द उठाना चाहते हैं तो उन्हें परमेश्वर की विधियों को नज़रंदाज करना होगा। अब हम यह देख चुके हैं कि मनुष्य जाति में पाप किस प्रकार आया।
आदम की वाटिका में आदम और हव्वा ने उस दिन एक अहम निर्णय को लिया था। उनके उस निर्णय का परिणाम उन्के और उन्की संतानें पर जीवन भर के लिये हुआ।
हर एक निर्णय जो हम अपने जीवन में लेते हैं, उन्के कुछ न कुछ परिणाम होते हैं। जो कुछ हम बोते हैं, हम सबको वही काटना प़डता है। कई बार तो जो कुछ हम बोते हैं उसके परिणाम में हमारे बच्चों को उससे भी कई ब़ढकर क़डवे फ़ल काटना पडता हैं। आदम के विषय - उसे और उसकी पत्नी को उन्के बाकी जीवन भर के लिये परमेश्वर की उपस्थिति से बाहर निकाल दिया गया।
इस्लिये हमें यह कल्पना नहीं कर लेना चाहिये कि वे छोटे छोटे चुनाव जो हम आज करते हैं वे महत्वहीन है या जो कुछ हम आज बोते हैं उसकी फ़सल भविष्य में कभी नहीं काटेंगे। परमेश्वर हमें विभिन्न लोगों और परिस्थितियों के द्वारा पराखे जाने की अनुमति देता है ताकि हम यह सिद्ध कर सकें कि हम संसार की बातों से ब़ढकर उससे ही प्रेम करते हैं। हमारी हर परीक्षा का उद्देश्य यही है कि हम इस बात में परखे जाएं कि क्या हम स्रष्टि की सारी बतों से ब़ढकर अपने स्रजनहार को महत्व देते हैं।
सभी पापों का सार है स्रष्टि की बातों को और स्वयं को परमेश्वर से ब़ढकर महत्व देना। यह परमेश्वर के मांगों को छो़डकर स्वयं के मागों का चुनाव है। यह परमेश्वर को प्रसन्न करने की बजाए स्वयं को प्रसन्न करने का चुनाव है।
केवल व्यभिचार करना, हत्या करना या चोरी करना ही पाप नहीं है। यह हमारे अपने मांगो का चुनाव है। एक छोटे बालक की ज़िद में हम पाप की शुरुवात को देखते हैं। पाप, हर बच्चे के जन्म से ही उस्के स्वभाव में निहित होता है और और जैसे जैसे वह बाल्क ब़ढता है वैसे वैसे वह वह अपने मांगो को चुनता है ताकी वह दूसरे बच्चों से ल़डकर उन बातों को हासिल करे जिनकी वह इच्चा रखता हैं।
जब हम वयस्क हो जाते हैं, तब भी हम अप्ने बचपन के गुणों से बहुत अधिक भिन्न नही होते। हम केवल चतुर बन जाते है और हमारे तरीके बदल जाते है! यहाँ तक की सभ्य लोग भी वैसे ही हो जाते है। वह अपना स्वार्थ, लालच और अभिलाषा को दिखावटी, नम्रता और शायद धर्म के आ़ड में छिपाते हैं।
पाप हमारे रोम-रोम में निहित है। हम धार्मिक कर्मों, जैसे प्रर्थना या तीर्थयात्रा या स्वयं के नियात्रण के द्वारा उससे छुटकारा नही पा सकते। केवल परमेश्वर ही हमें पाप से बचा सकता है।
परंतु जब तक हम बुराई को पाप के रूप में मान नहीं लेते, परमेश्वर हमर इंतज़ार करता है। येशु ने कहाँ कि वह ’धर्मियों’ के लिये नहीं परंतु पापियों के लिये आया। उसका अर्थ यह नहीं था कि उस समय प्रत्वी पर कुछ लोग धर्मी थे और बाकि लोग पापि थे। यह बात उसने व्यंगात्मक भाव में उन लोगों के लिये कहा था जो स्वयं को धार्मी समझते थे। येशु के कहने क अभिप्राय यह था कि वह उन लोगों को नहीं बचा सकता जो अपनी ही द्रष्टी में ’धार्मिक’ थे। केवल वे ही लोग जो यह मानते हैं कि वे बीमार हैं, डाँक्टर के पास जाएंगे। इस्लिये हमें सर्वप्रथम इस बात को मानने की जरुरत है कि हम पापी हैं।
हमारा कोई भी धर्म-विश्वास क्यों न हो, हम सभ पापी ही हैं। हमने परमेश्वर के पवित्र नियमों का उल्लंधन किया है - हमारे विचारों, श्ब्दों, कायों, नीति और इरादो के विषय में। हम परमेश्वर के मापदण्ड में कम पाए गये हैं।
हमारे शरीर में बीमारी से ब़ढकर पाप हमारी आत्मा के लिये कहीं ज्यादा नुकसानदायक है। परंतु क्या हम इस बात को स्वीकार करते है?
शारीरिक संभंध स्थापित करने के द्वारा संसार बर में फ़ैलने वाली खतरनाक बीमारी एड्स के विशय आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
एड्स एसी छुत कि बीमारी है कि इससे ग्रस्थ व्यक्ती के पास जाने से भी डरते है। वास्तव में पाप उससे भी ज्यादा बुरा है - इस्में फ़रक केवल इतना है कि पाप हमारी आतमा को नुकसान पहुंचाता है। यह बाह्र्य रुप में दिख नहीं प़डता। पाप का प्रभाव एड्स से कहीं ब़ढकर अधीक बुरा है। यदी हम पाप से बचाए न गये तो वह हमारे जीवनों को नष्ट कर्ता, संसार में हमें करता और अंत में हमे अनंतकाल के लिये नष्ट कर डालता है।
3. हमारे विवेक के विषय वास्तविक सत्य हम सब विवेक के साथ सिरजे गये है जो हमें निरंतर यह याद दिलाता रहता है कि हम सदाचारी प्राणी हैं। विवेक हमारे अंदर परमेश्वर की आवाज़ है जो हमें यह बताती रहती है कि हम अपने कर्मों के लिये जवाबदार हैं। एक दिन हमें हमारे जीवन में किये गये कर्मों के लिये परमेश्वर को जवाब देना होगा।
हम जान्वरों के समान नहीं हैं जिन्हें विवेक नहीं होता और जिन्हें किसी भी बात के लिये परमेश्वर को जवाब नही देना होगा। जब कोई जानवर मर जाता है, तब यही उसका अंत होता है। परंतु हमारे लिये एसा नहीं है। मनुष्य, परमेश्वर की समानता में बनाया गया और अनंतकाल तक जीवित रहने वाला प्राणी है।
हमारे लिये न्याय का दिन ठहराया गया है। उस दिन, हर एक कार्य जो हमने किया, वे विचार जो जीवन भर हमने कहा और सोचा, हमें याद दिलाए जएंगे और परमेश्वर द्वारा परखे जाएंगे। और वह बाईबिल में दिये गये उसके पवित्र नियमों के अनुसार, हमारा न्याय करेगा। तब हमें हमारे द्वारा हर एक कार्य शब्द और विचार के लिये परमेश्वर को जवाब देना होगा।
बाइबिल कहती हैं, "मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है" (इब्रानियों 9:27)।
इस संसार में कई लोग उन्के गुनाहों की सजा से बच जाते हैं। परंतु जब वे परमेश्वर के न्याय के सिंहासन के सामने ख़डे होंगे, तब उन्हें उस्के कार्यों की उच्चित सजा मिलेगी। उसी प्रकार कई लोग हैं जिन्हें दूसरों की भलाई करने के लिये इस संसार में कभी प्रशंसा या प्रतिफ़ल नहीं मिला। जब इस प्रथ्वी पर मसीह वापस आयेगा तब उन्हें भी उनका प्रतिफ़ल मिलेगा।
क्योंकि एक दिन हमें हमारे कर्मों के लिये परमेश्वर को जवाब देना होगा, हमें हमारे विवेक की आवाज़ को हमेशा सुनना होगा।
विवेक, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा दिया गया सबसे ब़डा दान है। यह ठीक एसा ही है जैसे हमारे शरीर मे दिया हुआ ’दर्द’ का दान। हममें से अधिकांश लोग दर्द को पी़डादायक समझते हैं। परंतु हम यह नहीं समझ पाते कि दर्द हमारे जीवन के लिये कितनी ब़डी आशीष है। क्योंकि यह दर्द ही है जो हमें यह सुचित करता है कि शरीर में कहीं तो कोई ग़डब़ड है। यदी दर्द न होता तो हमें भीमारी का आभास भी न हो पाता और हम मर जाते। दर्द ही हमें असामायिक म्रत्यु से बचाता है।
को़ढियों को दर्द का आभास नहीं होता क्योंकि को़ढ शिराओ को मार देता है। एक को़ढी के पैर में यदि खीला ठोक दिया जाए तौभी उसे उसका आभास नहीं होगा। पैर स़डने लगेगा और उसे पता भी नहीं चलेगा। अंत में उसका पैर इतना खराब हो जएगा की उसे काटकर अलग करना प़डेगा - यह सब इसलिये होगा क्योंकि उसके पास ’दर्द की आशिष’ नहीं है।
विवेक दर्द के समान है। जब हम परमेश्वर का नियमों का उल्लंधन करते है, पाप कर्ने की सोचते हैं या पाप कर चुके होते हैं तब वह हमें चेतावनी देता है। यदी हम उस चेतावनी की उपेक्षा करते हैं और उसके विरुध जाते हैं तो धीरे-धिरे हम हमारे भितर के पाप के प्रति चेतना को खत्म कर देते हैं। और फ़िर एक दिन एसा अएगा जब हम पाप के विषय चेतनारहित हो जाएंगे। तब हम आत्मिक को़ढि बन जाएंगे - जिसका विवेक मर चुका हो। तब हम भी उन जान्वरों के समान हो जाएंगे जिन्हें विवेक नहीं होता। यही कारण है कि कुछ लोग जानवरों से भी बदतर व्यवहार करते हैं। ऐसे जीवन का अंत परमेश्वर द्वारा अनंतकालीन सजा ही रहेगा।
हम सब यह जानते हैं कि हम पापी है क्योंकि हमारा विवेक हमें यह बताता है। हमें उस दोषी भावना को यू ही टाल नहीं देना चाहिये क्योंकि दोषी होने की चेतना ही ’दर्द की आशीष’ है। यह हमें बतात है कि हम रोगी है और हमें चंगाई की जरुरत है। विवेक, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सबसे ब़डा तोह्फ़ा है।
यीशु ने कहा कि विवेक आँख के समान है (लूका 11:34-36)।
हमारी आँखे शरीर में के सबसे स्वच्छ अंगों में से है क्योंकि वे प्रतिदिन कई बार हमारे आसुओ से धोए जाते हैं।
हर बार जब भी हमारी आँखें झपकती है (खुलती-बंद होती हैं) (जो दिन में हजारों बार होता है जिस्का हमें एहसास भी नहीं होता) उसमें की सारी गंदगी निकल जाती है। कचरे का एक छोटा सा कण भी हमारी आँखे में जलन पैदा कर्ने के लिये काफ़ी है जब तक हम उसे आँख से धोकर निकाल नहीं देते। इसी प्रकार हमें अपने विवेक को भी शुद्ध रखना चाहिये - हमेशा शुद्ध।
हमारे पाप केवल परमेश्वर द्वारा ही क्षमा किये जा सकते हैं और धोए जा सकते हैं। यही एक तरीका है हमारे विवेक को दोष की भावना से मुक्त करने का, परंतु पापों की क्षमा सस्ती नहीं।
बुराई के विषय वास्तविक सत्य
संसार के महान रहस्यों में से एक जिसे लोगों ने समझने की अथक कोशिशों की वह है बुराई का रहस्य।
वह संसार जिसे सर्वज्ञानि और भले परमेश्वर ने बनाया उस्में बुराई की शुरूवात कहाँ से हुई?
संसार के हर क्षेत्र में बुराई का वर्चस्व क्यों होता है? और सब जगह इतनी बीमारियाँ, गरीबी, दुख और क्लेश क्यों पाया जाता है? क्या परमेश्वर हामारी मदद करने में रूचि नहीं रखता? य़े ऐसे प्रश्न हैं जिनका हल खोजना है। और बाइबिल हमें उसका उत्तर देती है।
परंतु इससे पहले कि हम इस विषय में आगे ब़ढें, आइये हम परमेश्वर के विषय कुछ सच्चाइयों से अवगत हो जएं।
परमेश्वर का अस्तित्व अनंतकाल से है। उसकी कोई शुरूवात नहीं है। जिसे हम समय या युग के नाम से जानते हैं वह उसकी भी सीमा के बहुत पहले से अस्तित्व में है। इस बात को समझ पाना हमरे लिये बहुत कठिन है। यह केवल इसलिये कि हमरे दिमाग परमेश्वर की बुद्धि को समझ ही नहीं सकता - ठीक उसी प्रकार जैसे एक कप अपने आप में समुद्र के जल को समा सकने में असमर्थ होता है।
बाईबल की पहली आयत इस प्रकार है:
"आदि में परमेश्वर...(उत्पत्ति 1:1)*
(*उत्पत्ति की पुस्तक बाईबिल की 66 पुस्तकों मे से पहली पुस्तक है। कोष्टक में दिये गये सभी संदर्भ बाईबिल की पुस्तको में से किसी न किसी पुस्तक से संबंधित हैं।
बाईबिल, परमेश्वर अनंतकालीन अस्तित्प का है सिद्ध करने की कोई कोशिश नहीं करती। वह इस बात को सत्य घोषित करती है।
बाईबिल में परमेश्वर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है जो हमारे साथ व्यक्तिगत् संबंध रखने की इच्छा रखता है। वह एक मनुष्य नहीं है जैसा हम एक व्यक्ति को समझ्ते हैं। वह एक आत्मा है, हर द्रष्टिकोण से अनंत और स्वभाव से कभी न बदलने वाला। वह सर्वशक्तिमान सर्वज्ञानी, अनादिकाल से बुद्धिमान, अनादिकाल से प्रेमि, अनादिकाल से पवित्र है।
परमेश्वर का अनादि प्रेम स्वार्थरहित है। और इस्लिये आरंभ से ही वह अपनी खुशी को दूसरों के साथ बांटने की इच्छा रखता है।
यही कारण है कि उसने जीवित प्रानियों की रचना किया। सर्वप्रथम उसने लाखों स्वर्गदूतों को बनया। ताकि वह अपनि महिमा और आनंद को उनके साथ बांट सके। यह मनुष्य के स्रजे जाने के बहुत पहले हुआ।
स्वर्गदूतों में उनका अगुवा होने के लिये लूसिफर को ब्नाया। वह नाम जो आज दुष्टता का प्रतीक है, किसी समय स्वर्गदूतों में सबसे बुद्धिमान और सबसे सुंदर के नाम से जाना जाता थ। वह प्रधान स्वर्गदूत था।
परमेश्वर ने लूसिफर के विषय कहा:
"तू तो उत्तम से भी उत्तम है, तू बुद्धि से भरपूर और सर्वांग सुंदर है। तू परमेश्वर की अदन नामक बारि में था, तेरे पास आभूषण, मणिक, पद्यराग, हीरा, फीरोज़ा, सुलैमानी मणि, यशभ, नीलमणि, मरकद, और लाल सब भांति के मणि और सोने के पहरावे थे, तेरे डफ और बांसुलियां तुझी में बनाई गई थी, जिस दिन तू सिरजा गया था, उस दिन वे भी तैयार की गई थीं। तू छानेवाला अभिषिक्त करूब था, मैंने तुझे ऐसा ठहराया कि तू परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर रहता था, तू आग सरीखे चमकने वाले मनियों के बीच चलता फिरता थ्ज्ञा। जिस दिन से तू सिरजा गया, और जिस दिन तक तुझ मे कुटिलता न पाई गई, उस समय तक तू अपनी सारी चालचलन में निर्दोष रहा" (यहजकेल 28:12-15)।
परमेश्वर ने जो तारे और पे़ड बनाए, उनसे हटकर लूसिफर और अन्य दूतों को परमेश्वर की आज्ञापालन करने या न करने के चुनाव की छूट थी।
एक व्यक्ति को सदाचारी होने के लिये उसकी स्वेच्छा प्रथम आवश्यक बात है।
तारे और पे़ड भला या बुरा नहीं कर सकते क्योंकि उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। वे निर्विवाद परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं क्योंकि वे चुनाव की स्वतंत्रता रहित स्रजे गये हैं। इसलिये वे किसी भी पहलू से परमेश्वर के पुत्र नहीं हो सकते। एक वैज्ञानिक द्वारा बनाया गया रोबोट उसे बनाए गए प्रोग्राम के अनुसार उसकी हर आज्ञा का पालन करेगा, परंतू उसका बेटा ऐसा नहीं करेगा। फिर भी रोबोट उस वैज्ञानिक का बेटा नहीं बन सकता।
एक व्यक्ति को सदाचरी होने के लिये उसे भले-बुरे का ज्ञानी होना दूसरी आवश्यकता है। पक्षी और जानवर स्वेच्छा से कार्य करने का चुनाव कर सकते हैं। परंतू वे सदाचारी नहीं है क्योंकि उन्हें भले-बुरे का ज्ञान नहीं होता। इसलिये वे न पवित्र और न ही पापी होते हैं। इसलिये वे परमेश्वर की संतान नहीं होते क्योंकि परमेश्वर एक सदाचरी व्यक्तित्व है।
वास्तत्व में पक्षी और जानवर किसी भी हाल में आपके संतान नहीं हो सकते।
आप एक कुत्ते को आपका आज्ञाकारी होने का प्रशिक्षण दे सकते हैं। परंतु फिर भी आप का बेटा नहीं बन सकता क्योंकि आपके बेटे में आपका स्वभाव होना जरूरी है - और यह बात कुत्ते में है ही नहीं।
परंतु परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया। यही बात हमें उसकी संताना बनने में संभब बनाती है।
विवेक हमरे भीतर वह आवाज़ है जो हमें सदाचारी होने की याद दिलाता है और जब हम परमेश्वर के नियमों क उल्लधंन करते हैं तब वह हमें दोषी ठहराता है।
दूतों को स्वेच्छाबलि और विवेक के सात स्रजा गया था। इस प्रकार वे परमेश्वर के द्वरा स्रष्टि किये जाने के समय कुछ भिन्न थे क्योंकि वे सूझ-बूझ रखने वाले सदाचारी थे। फिर भी अगुवे लूसिफर के ह्र्दय में ऐसे विचार और जिज्ञासाएं उठने लगे जो अच्छे नहीं थे।
यही वह समय था जब इस संसार में बुराई की शुरुवात हुई।
लूसिफर के केवल विचार ही बुरे नहीं थे परंतु उसके विचार घमंड, विद्रोह और असंतोष से परिपूर्ण थे।
जब तक लूसिफर में बुरे विचार नहीं आए तब तक यह संसार पूर्णत: पवित्र था। परंतु अब बुराई ने स्रजे हुए मनुष्य के भीतर जिसे भले-बुरे का ज्ञान है, अपना विक्रत सिर उठा लिया है।
याद रखें कि बुराई की शुरूवात ह्र्दय से हुई। यह बाहर्य प्रक्रियाओ से नहीं आई। आज भी, बुराई का जन्म ह्रदय से ही होता है।
यह भी याद रखें कि सबसे पहला पाप जिससे सारे संसार में बुराई फैल गई वह घमंड ही था। परमेश्वर ने लूसिफर को उसकी उपस्थिति से हटा दिया। और उसी समय से लूसिफर शैतान कहलाया गया।
बाईबिल शैतान के पतन का वर्णन इस प्रकार करती है:
"हे भोर के चमकने वाले तारे तू कैसे आकाश से गिर प़डा है। तू जो जाति जाति कॊ हरा देता था, तू अब कैसे काटकर भूमि पर गिराया है? तू मन में कहता तो था, ’मैं स्वर्ग पर चडूंगा, मैं अपने सिंहासन को ईश्वर के तारागण से अधिक ऊंचा करूंगा; और उत्त्र दिशा की छोर पर सभा के पर्वत पर विराजूंगा।’ मैं मेघों से भी ऊंचे स्थानों के ऊपर चढूंगा, मैं परमप्रधान के तुल्य हो जाऊंगा। परंतु तू अथोलोक में उस गडहे की तह तक उतारा जाएगा" (यशायाह 14:12-14)।
परंतु जब तक लूसिफर गिराया जाता वह उसके विद्रोह में कुछ अन्य दूतों को भी शामिल करने में सफल हो गया। लाखों दूत उसके साथ शामिल हो गए - अर्थात स्वर्ग के 1 तिहाई दूत (जैसा हम प्रकाशितवाक्य 12:4 में प़ढते हैं)। इसलिये परमेश्वर ने लूसिफर के साथ उन्हें भी गिरा दिया। गिराए हुए यही दूत दुष्ट आत्माएं (दानव) हैं जो आज लोगों को सताते और तकलीफ देते हैं।
शायद आप भी दुष्ट आत्माओं या दूसरे जादू-टोना करने वालों द्वारा सताए गए हों। यदि ऐसा हुआ है तो बाईबिल में आपके लिये शुभ संदेश है। आप उनके सताव से हमेशा के लिये पूर्णत: स्वतंत्र हो सकते हैं।
इस पुस्तक को ध्यान से प़ढे और जब आप इसके अंत में पहुचेंगे तब आप समझ पाएंगे कि परमेश्वर आपके लिये कैसे चमत्कार कर सकता है।
कुछ लोग यह पूछ सकते है कि "यदि संसार में बुराईयों की सारी ज़ड शैतान ही है तो परमेश्वर शैतान और अन्य दुष्टात्माओ को ही नष्ट क्यों नहीं कर देता?" यदि परमेश्वर चाहे तो निश्चित रूप से एक क्षण में एसा कर सकता है। परंतु वह ऐसा नहीं करता। यह इस बात कि पुष्टि करता है कि शैतान और दुष्टात्माओ के अस्तित्व में बने रहने देने में सर्वज्ञानी परमेश्वर का एक उद्देश्य है। उसके उद्देश्य का एक भाग यह है कि वह शैतान द्वारा प्रथ्वी पर मनुष्य के जीवन को जटिल, असुरक्षित, खतरनाक बनाना चाहता है ताकि मनुष्य संसार में सुख-सुविधाओं में ध्यान न लगाकर परमेश्वर की और अनंत जीव न के विषय सोचें।
यदि प्रथ्वी पर जीवन अत्यंत आरामदायक होता जहाँ कोई बीमारी, क्लेश, गरीबी, आपदाएं आदि न होते तो शायद ही कोई परमेश्वर का विचार करता। इसलिये परमेश्वर इन सभी आपदाएं और असुरक्षाओं के उपयोग द्वारा हमें उसके विषय सोचने और जरूरत में उसकी ओर फिरने के लिये करता है।
यहाँ तक कि जो समस्याएं बीमारियाँ और परिक्षाएं शैतान आपके जीवन में लाता है वे भी प्रेमी परमेश्वर की अनुमति से ही अते हैं ताकि आप जीवन में लाता है वे भी प्रेमी परमेश्वर की अनुमति से ही आते हैं ताकि आप परमेश्वर के प्रेम का दर्शाता है। यह बाईबिल का संदेश है।
मैंने एक व्यापारी के विषय सुना जो किसी समय परमेश्वर के निकट था। जैसे ही उस्का व्यव्साय ब़ढा वह परमेश्वर से दूर हो गया। उसके चर्च के बुजुर्गों ने उससे बार-बार इस विषय बात की और उसे परमेश्वर के ओर लौटा लाने के प्रयत्न भी किये। परंतु वह अपने व्यवसाय मेंही अत्याधिक व्यस्त रहा। एक दिन उसके तीन बेटो में से सबसे छोटे बेटे को जहरीले सांप ने काट लिया और बच्चा गंभीर रीति से बीमार हो गया। यहाँ तक कि डाँक्टरों ने भी उसके बचने की उम्मीद छो़ड दिये। तब उस बच्चे का पिता सचमुच ब़डा चिंतित हो गया और चर्च के एक बुजुर्ग को बच्चे के लिये प्रार्थना करने को बुलवा भेजा। वह बुजुर्ग एक समझदार व्यक्ति था। उसने आकर यह प्रार्थना किया, "परमेश्वर इस बच्चे को काटने के लिये सांप को भेजने के लिये धन्यवाद - क्योंकि आपके बारे सोचने के लिये मैं इस परिवार को कभी तैयार नहीं कर पाता। परंतु 6 वर्ष में भी में जो नही कर पाया वह इस सांप ने एक क्षण में कर दिया! अब जब कि आपके विषय याद दिलाने के लिये उन्हें कभी किसी सांप की जरूरत न प़डे।"
कुछ लॊग ऐसे हैं जो कभी परमेश्वर के बारे में सोचते ही नही है तब तक जब तक कि वे अचानक एक दिन कैंसर या किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होकर अस्प्ताल नहीं पहुंच जाते। तब वे परमेश्वर के विषय सोचते और उद्धार के लिये उस्की ओर फिरते हैं। कभी न सुधराने वाले रोग, बिमारियां, गरीबी और संसार की कई बुराईयां मनुष्य को पाप से फेर लाने के लिये परमेश्वर उपयोग में लाता है। इस प्रकार परमेश्वर उन्हें स्वर्ग में अनंतकाल के निवासों तक पहुंचने में सहायता करता है। शैतान द्वारा किये जाने वाली बुराईयों का उपयोग करके लोगों को शैतान के ही शिकंजों से छु़डाकर उन्हें अनंतकालीन उद्धार दिलाने का परमेश्वर का यही तरीका है।
इस प्रकार परमेश्वर शैतान को बार-बार मूर्ख बनाता है।
जो गढ्ढा शैतान दूसरों के लिये खोदता है वह स्वयं उसी में ढकेला जाता है।
शैतान का अस्तित्व बने रहने का दूसरा कारण है परमेश्वर की संतानों को पवित्र बनाना।
आग के उदाहरण को देखें। संसार के इतिहास में लाखों लोग आग में झुलसकर मर गये। फिर भी इसके कारण आग का उप्योग करना कोई बंद नहीं कर देता। क्यों? वह इसलिये कि आग के ही द्वारा भोजन पकाया जाता है, गाड़ियां चलती है और विमान उ़ढाया जाता है और यंत्र चलाए जाते हैं। सोना भी आग में तपाकर शुद्ध किया जा सकता है। इसलिये आग भले ही नुकसानकारक और खतरनाक है, अच्छे कामों में उपयोग में लाई जा सकती है।
उसी प्रकार शैतान यद्यपि बुरा है और लोगों को गुमराह करता है फिर भी परमेश्वर उसका उपयोग करता है। शैतान को यह अनुमति है कि वह कई अग्निपरिक्षाओं और परेशानियों के जरिये परमेश्वर की संतानों की परिक्षा ले ताकि वे पवित्र और शुद्ध बने जैसे सोना आग में डालकर शुद्ध किया जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि परमेश्वर संसार की सारी बुराईयों को एक ही क्षण में खत्म कर सकता है, फिर भी वह ऐसा नहीं करता क्योंकि वह अपने महिमामय उद्धेश्यों को उन्हीं के माध्यम से पूरा करता है।
पाप के विषय वास्तविक सत्य
कुछ लोग अक्सर जानवरों जैसा व्यवहार क्यों करते हैं?
उत्तर है: क्योंकि उनकी रुचि केवल उनके शारीरिक जरूरतों और प्रथ्वी पर उनके अस्तित्व में ही होती है।
एक जानवर की रूचि किन बातों में होती है? भोजन, नींद और लैंगिक समाधान। और जब एक मनुष्य भी केवल इन्हीं बातों में रूचि रखता है तब हम कह सकते हैं कि वह जानवर के स्तर तक गिर चुका है।
परंतु परमेश्वर ने मनुष्य के जानवर के समान रहने के लिये नहीं बनाया। उसने हमें उसकी समानता में बनाया - सदाचारी, धर्मी, चरित्रवान और सयंमी, और जानवरों सी भावनाओं के दासत्व से मुक्त।
जानवरों से अधिक समझदारी और शिक्षा हमें उनसे बेहतर नहीं बनाती। प़ढे लिखे शिक्षित और समझदार लोग भी लालच, स्वार्थीपन, लैंगिक अभिलाषा, क्रोध, आदि के गुलाम होते हैं।
हमारे अंगों में एक अंग है जो हमारे विचारों से भी ब़ढकर सक्षम है। वह है हमारी आत्मा जो हमें परमेश्वर के विषय सजय करती है। वह किसी जानवर में नहीं होती।
हमने देखा कि परमेश्वर ने हमें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की सामर्थ वाले सदाचारी व्यक्ति बनाया है। परंतु निर्णय लेने या चुनाव करने की स्वतंत्रता में यह खतरा भी है कि हम इस स्वतंत्रता का उपयोंग परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंधन के लिये कर सकते हैं। परंतु परमेश्वर ने यह जेखिम उठाया - क्योंकि वह ऐसी संतान चाहता था कि स्वयं उसके विषय निर्णय लेने वाले हों। संसार में सारी अव्यवस्था, बीमारियां और बुराईयां मनुष्य द्वारा परमेश्वर की आज्ञा उल्लंधन और शैतान के प्रति समर्पन का ही सीधा परिणाम है।
प्रथम पुरुष और स्त्री जिन्हें परमेश्वर ने बनया आदम और हव्वा कहलाए। जब वे स्रजे गये थे तब वे निर्दोष थे। पवित्र बने रहने के लिये उन्हें ही चुनाव करना था। और चुनाव करने के लिये उन्हें परीक्षा से गुजरना था ताकि वे बुराई का इंकार करें और केवल परमेश्वर को चुनें। इस्लिये परमेश्वर ने शैतान को उनके पास आने और उन्की परीक्षा लेने की अनुमती दिया। इस बात को हम बाइबिल की प्रथम पुस्तक उत्पत्ति दूसरे और तीसरे अध्यायों में प़ढ्ते है।
निर्दोषता और पवित्रता में काफी अंतर है। निर्दोषता वह है जो हम एक शिशु कें देख्ते हैं। यदी आप जानना चाहते हैं की जब आदम सिरजा गया तब वह क्या था तो एक शिशु को देखें - जो निर्दोष, और जिसे भले और बुरे का ज्ञान न हो। परंतु वह बच्चा न पवित्र है न ही सिद्ध। सिद्ध होने के लिये उस शीशु को ब़ढना होगा और बुराईयों का इन्कार और परमेश्वर का चुनाव कर्ने के द्वारा कुछ निर्णय लेना होगा।
जब हम हमारे विचारों में परिक्षाओं में गिर्ने से इन्कार करते हैं तब हम चरित्र का निर्माण करते हैं। आज आप जो भी हैं वह आपके द्वारा जीवन में अब तक किये गये अच्छे चुनावों का वजह से हैं। यदि आपके इर्द-गिर्द के लोग आपसे बेह्तर है वह इस्लिये कि उन्होंने आपकी तुलना में बेह्तर चुनाव किया। हम सभी प्रतिदिन चुनाव करते हैं - और वे चुनाव ही निश्चित करते हैं कि हमें क्या बनना है।
जब परमेश्वर ने प्रथम पुरुष और स्त्री को बनाया उसने उन्हें शैतान द्वारा परखे जाकर पवित्र होने के लिये अदसर दिया। उस्ने उन्हें एक बाग में रखा और कहा कि वे एक छोडकर बाकी सभी व्रक्षों के फल को खा सकते हैं।
यह एक परीक्षा थी - क्योंकि वे ऐसे बाग में रखे गये थे जहां लुभाने वाले कई फलों के व्रक्ष के छो़डकर सभी व्रक्ष के फल खा सकते थे। परंतु वे आज्ञापालन की सामान्य परीक्षा में असफल हो गये। वह इस्लिये हुआ क्योंकि शैतान ने हव्वा को यह कहकर बहका दिया कि यदि वे मना किये गये व्रक्ष के फल को खा लें तो के भी परमेश्वर के तुल्य हो जाएंगे। उस समय आदम और हव्वा की परिक्षा केवल फल खाने या न खाने की नहीं थी परंतु उन्के परमेश्वर के तुल्य होने के चुनाव की परिक्षा थी।
यही इच्छा किसी समय शैतान ने भी किया था। और इसी बात के लिये उसने आदाम और हव्वा को भी प्रेरित किया। यह सच है कि शैतान के उन्से जो कुछ कहा वह एक झूठ था - ठीक वैसा ही झूठ जैसा वह आज भी लोंगों को धोखा देने के लिये करता है। जैसा आज भी लोग शैतान के झूठ में फस जाते है वैसे ही आदम और हव्वा भी फस गये। उन्होंने परमेश्वर की उपस्थिति से निकले गये। इन सब बातों का विवरण बाईबिल की प्रथम पुस्तक में प़ढा सकता है (उत्पत्ति अध्याय 3)।
आदम और ह्व्वा ने सोचा कि परमेश्वर की आज्ञा उल्लंधन के द्वारा वे ठीक परमेश्वर मे ही समान सर्वसामर्थी सुर स्वतंत्र हो जाएंगे। परंतु क्या वे स्वतंत्र हो सके? नहीं। वे केवल शैतान के गुलाम होकर रह गये। केवल परमेश्वर की आज्ञापालन के द्वारा ही हम वास्तव में स्वतंत्र हो सकते हैं। इसी बात में शैतान बहुत से लोगों को गुमराह करता है। वह उनसे कहता है के यदि वे सचमुच जीवन का आनंन्द उठाना चाहते हैं तो उन्हें परमेश्वर की विधियों को नज़रंदाज करना होगा। अब हम यह देख चुके हैं कि मनुष्य जाति में पाप किस प्रकार आया।
आदम की वाटिका में आदम और हव्वा ने उस दिन एक अहम निर्णय को लिया था। उनके उस निर्णय का परिणाम उन्के और उन्की संतानें पर जीवन भर के लिये हुआ।
हर एक निर्णय जो हम अपने जीवन में लेते हैं, उन्के कुछ न कुछ परिणाम होते हैं। जो कुछ हम बोते हैं, हम सबको वही काटना प़डता है। कई बार तो जो कुछ हम बोते हैं उसके परिणाम में हमारे बच्चों को उससे भी कई ब़ढकर क़डवे फल काटना पडता हैं। आदम के विषय - उसे और उसकी पत्नी को उन्के बाकी जीवन भर के लिये परमेश्वर की उपस्थिति से बाहर निकाल दिया गया।
इस्लिये हमें यह कल्पना नहीं कर लेना चाहिये कि वे छोटे छोटे चुनाव जो हम आज करते हैं वे महत्वहीन है या जो कुछ हम आज बोते हैं उसकी फसल भविष्य में कभी नहीं काटेंगे। परमेश्वर हमें विभिन्न लोगों और परिस्थितियों के द्वारा पराखे जाने की अनुमति देता है ताकि हम यह सिद्ध कर सकें कि हम संसार की बातों से ब़ढकर उससे ही प्रेम करते हैं। हमारी हर परीक्षा का उद्देश्य यही है कि हम इस बात में परखे जाएं कि क्या हम स्रष्टि की सारी बतों से ब़ढकर अपने स्रजनहार को महत्व देते हैं।
सभी पापों का सार है स्रष्टि की बातों को और स्वयं को परमेश्वर से ब़ढकर महत्व देना। यह परमेश्वर के मांगों को छो़डकर स्वयं के मागों का चुनाव है। यह परमेश्वर को प्रसन्न करने की बजाए स्वयं को प्रसन्न करने का चुनाव है।
केवल व्यभिचार करना, हत्या करना या चोरी करना ही पाप नहीं है। यह हमारे अपने मांगो का चुनाव है। एक छोटे बालक की ज़िद में हम पाप की शुरुवात को देखते हैं। पाप, हर बच्चे के जन्म से ही उस्के स्वभाव में निहित होता है और और जैसे जैसे वह बाल्क ब़ढता है वैसे वैसे वह वह अपने मांगो को चुनता है ताकी वह दूसरे बच्चों से ल़डकर उन बातों को हासिल करे जिनकी वह इच्चा रखता हैं।
जब हम वयस्क हो जाते हैं, तब भी हम अप्ने बचपन के गुणों से बहुत अधिक भिन्न नही होते। हम केवल चतुर बन जाते है और हमारे तरीके बदल जाते है! यहाँ तक की सभ्य लोग भी वैसे ही हो जाते है। वह अपना स्वार्थ, लालच और अभिलाषा को दिखावटी, नम्रता और शायद धर्म के आ़ड में छिपाते हैं।
पाप हमारे रोम-रोम में निहित है। हम धार्मिक कर्मों, जैसे प्रर्थना या तीर्थयात्रा या स्वयं के नियात्रण के द्वारा उससे छुटकारा नही पा सकते। केवल परमेश्वर ही हमें पाप से बचा सकता है।
परंतु जब तक हम बुराई को पाप के रूप में मान नहीं लेते, परमेश्वर हमर इंतज़ार करता है। येशु ने कहाँ कि वह ’धर्मियों’ के लिये नहीं परंतु पापियों के लिये आया। उसका अर्थ यह नहीं था कि उस समय प्रत्वी पर कुछ लोग धर्मी थे और बाकि लोग पापि थे। यह बात उसने व्यंगात्मक भाव में उन लोगों के लिये कहा था जो स्वयं को धार्मी समझते थे। येशु के कहने क अभिप्राय यह था कि वह उन लोगों को नहीं बचा सकता जो अपनी ही द्रष्टी में ’धार्मिक’ थे। केवल वे ही लोग जो यह मानते हैं कि वे बीमार हैं, डाँक्टर के पास जाएंगे। इस्लिये हमें सर्वप्रथम इस बात को मानने की जरुरत है कि हम पापी हैं।
हमारा कोई भी धर्म-विश्वास क्यों न हो, हम सभ पापी ही हैं। हमने परमेश्वर के पवित्र नियमों का उल्लंधन किया है - हमारे विचारों, श्ब्दों, कायों, नीति और इरादो के विषय में। हम परमेश्वर के मापदण्ड में कम पाए गये हैं।
हमारे शरीर में बीमारी से ब़ढकर पाप हमारी आत्मा के लिये कहीं ज्यादा नुकसानदायक है। परंतु क्या हम इस बात को स्वीकार करते है?
शारीरिक संभंध स्थापित करने के द्वारा संसार बर में फैलने वाली खतरनाक बीमारी एड्स के विशय आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
एड्स एसी छुत कि बीमारी है कि इससे ग्रस्थ व्यक्ती के पास जाने से भी डरते है। वास्तव में पाप उससे भी ज्यादा बुरा है - इस्में फरक केवल इतना है कि पाप हमारी आतमा को नुकसान पहुंचाता है। यह बाह्र्य रुप में दिख नहीं प़डता। पाप का प्रभाव एड्स से कहीं ब़ढकर अधीक बुरा है। यदी हम पाप से बचाए न गये तो वह हमारे जीवनों को नष्ट कर्ता, संसार में हमें करता और अंत में हमे अनंतकाल के लिये नष्ट कर डालता है।
हमारे विवेक के विषय वास्तविक सत्य
हम सब विवेक के साथ सिरजे गये है जो हमें निरंतर यह याद दिलाता रहता है कि हम सदाचारी प्राणी हैं। विवेक हमारे अंदर परमेश्वर की आवाज़ है जो हमें यह बताती रहती है कि हम अपने कर्मों के लिये जवाबदार हैं। एक दिन हमें हमारे जीवन में किये गये कर्मों के लिये परमेश्वर को जवाब देना होगा।
हम जान्वरों के समान नहीं हैं जिन्हें विवेक नहीं होता और जिन्हें किसी भी बात के लिये परमेश्वर को जवाब नही देना होगा। जब कोई जानवर मर जाता है, तब यही उसका अंत होता है। परंतु हमारे लिये एसा नहीं है। मनुष्य, परमेश्वर की समानता में बनाया गया और अनंतकाल तक जीवित रहने वाला प्राणी है।
हमारे लिये न्याय का दिन ठहराया गया है। उस दिन, हर एक कार्य जो हमने किया, वे विचार जो जीवन भर हमने कहा और सोचा, हमें याद दिलाए जएंगे और परमेश्वर द्वारा परखे जाएंगे। और वह बाईबिल में दिये गये उसके पवित्र नियमों के अनुसार, हमारा न्याय करेगा। तब हमें हमारे द्वारा हर एक कार्य शब्द और विचार के लिये परमेश्वर को जवाब देना होगा।
बाइबिल कहती हैं, "मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है" (इब्रानियों 9:27)।
इस संसार में कई लोग उन्के गुनाहों की सजा से बच जाते हैं। परंतु जब वे परमेश्वर के न्याय के सिंहासन के सामने ख़डे होंगे, तब उन्हें उस्के कार्यों की उच्चित सजा मिलेगी। उसी प्रकार कई लोग हैं जिन्हें दूसरों की भलाई करने के लिये इस संसार में कभी प्रशंसा या प्रतिफल नहीं मिला। जब इस प्रथ्वी पर मसीह वापस आयेगा तब उन्हें भी उनका प्रतिफल मिलेगा।
क्योंकि एक दिन हमें हमारे कर्मों के लिये परमेश्वर को जवाब देना होगा, हमें हमारे विवेक की आवाज़ को हमेशा सुनना होगा।
विवेक, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा दिया गया सबसे ब़डा दान है। यह ठीक एसा ही है जैसे हमारे शरीर मे दिया हुआ ’दर्द’ का दान। हममें से अधिकांश लोग दर्द को पी़डादायक समझते हैं। परंतु हम यह नहीं समझ पाते कि दर्द हमारे जीवन के लिये कितनी ब़डी आशीष है। क्योंकि यह दर्द ही है जो हमें यह सुचित करता है कि शरीर में कहीं तो कोई ग़डब़ड है। यदी दर्द न होता तो हमें भीमारी का आभास भी न हो पाता और हम मर जाते। दर्द ही हमें असामायिक म्रत्यु से बचाता है।
को़ढियों को दर्द का आभास नहीं होता क्योंकि को़ढ शिराओ को मार देता है। एक को़ढी के पैर में यदि खीला ठोक दिया जाए तौभी उसे उसका आभास नहीं होगा। पैर स़डने लगेगा और उसे पता भी नहीं चलेगा। अंत में उसका पैर इतना खराब हो जएगा की उसे काटकर अलग करना प़डेगा - यह सब इसलिये होगा क्योंकि उसके पास ’दर्द की आशिष’ नहीं है।
विवेक दर्द के समान है। जब हम परमेश्वर का नियमों का उल्लंधन करते है, पाप कर्ने की सोचते हैं या पाप कर चुके होते हैं तब वह हमें चेतावनी देता है। यदी हम उस चेतावनी की उपेक्षा करते हैं और उसके विरुध जाते हैं तो धीरे-धिरे हम हमारे भितर के पाप के प्रति चेतना को खत्म कर देते हैं। और फिर एक दिन एसा अएगा जब हम पाप के विषय चेतनारहित हो जाएंगे। तब हम आत्मिक को़ढि बन जाएंगे - जिसका विवेक मर चुका हो। तब हम भी उन जान्वरों के समान हो जाएंगे जिन्हें विवेक नहीं होता। यही कारण है कि कुछ लोग जानवरों से भी बदतर व्यवहार करते हैं। ऐसे जीवन का अंत परमेश्वर द्वारा अनंतकालीन सजा ही रहेगा।
हम सब यह जानते हैं कि हम पापी है क्योंकि हमारा विवेक हमें यह बताता है। हमें उस दोषी भावना को यू ही टाल नहीं देना चाहिये क्योंकि दोषी होने की चेतना ही ’दर्द की आशीष’ है। यह हमें बतात है कि हम रोगी है और हमें चंगाई की जरुरत है। विवेक, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सबसे ब़डा तोह्फा है।
यीशु ने कहा कि विवेक आँख के समान है (लूका 11:34-36)।
हमारी आँखे शरीर में के सबसे स्वच्छ अंगों में से है क्योंकि वे प्रतिदिन कई बार हमारे आसुओ से धोए जाते हैं।
हर बार जब भी हमारी आँखें झपकती है (खुलती-बंद होती हैं) (जो दिन में हजारों बार होता है जिस्का हमें एहसास भी नहीं होता) उसमें की सारी गंदगी निकल जाती है। कचरे का एक छोटा सा कण भी हमारी आँखे में जलन पैदा कर्ने के लिये काफी है जब तक हम उसे आँख से धोकर निकाल नहीं देते। इसी प्रकार हमें अपने विवेक को भी शुद्ध रखना चाहिये - हमेशा शुद्ध।
हमारे पाप केवल परमेश्वर द्वारा ही क्षमा किये जा सकते हैं और धोए जा सकते हैं। यही एक तरीका है हमारे विवेक को दोष की भावना से मुक्त करने का, परंतु पापों की क्षमा सस्ती नहीं।
क्षमा के विषय वास्तविक सत्य
परमेश्वर हमारें पापों को किस प्रकार क्षमा करता है?
परमेश्वर न्यायी और धर्मी परमेश्वर है और वह किसी व्यक्ति के पापों को नज़रंदाज करके माफ नहीं करता। यह तो अन्याय होगा।
परमेश्वर पवित्र और न्यायी परमेश्वर है। इस्लिये उसे पाप को दंडित करना ही होगा।
परंतु चुंकि वह प्रेमी परमेश्वर भी है उसने हमारे पापों की क्षमा के लिये मार्ग भी निकाला। हर धर्म हमें अच्छा, दयालु, और सत्यवादी होने की शिक्षा देता है। परंतु ये सारी बातें हमें क्षमा प्राप्ति के पश्चात् किस तरह रहना चाहिये उसके विषय बताती है। अच्छाई, दयालुता, और सत्यवाद एक इमारत के ढांचे हैं। पापों की क्षमा उस इमारत की बुनियाद हैं।
एक इमारत का सबसे महत्वपूर्ण भाग उस्की बुनियाद होती है।
परमेश्वर को हमारे पापों को क्षमा करने हेतु वह सब करना प़डा जो उसके लिये संसार की स्रष्टी के रचने से कहीं ज्यादा कठीन और तकलीफदायक था। संसार की रचना के लिये उसे केवल शब्द का उच्चारण करना था, और संसार तुरंत अस्तित्व में आ गया। परंतु हमारे पापों को वह शब्द के मात्र उच्चारण से माफ नहीं कर सका।
यदी मनुष्य के पाप क्षमा किये जाने थे तो एक ही मार्ग था। परमेश्वर को हमारे समान मनुष्य बनना प़डा।
उसे उन परीक्षाओं और परेशानियों से गुजरना प़डा जैसे हम मनुष्य अनुभव करते हैं। और उसे हमारी जगह एक बलिदान होकर मरना प़डा, और हमारे पापों की सजा उसे उठानी प़डी।
पाप की सजा क्लेश, बीमारी या गरीबी नहीं, और न ही इस संसार में निम्न स्तर पर जन्म लेना या इसी प्रकार की कोई और बात नहीं है। पाप की सजा अनंत म्रत्यु हैं - जो परमेश्वर से हमेशा के लिये दुर हो जाने के तुल्य है।
भौतिक म्रत्यु शरीर से अलग होना है। परंतु आत्मिक म्रत्यु परमेश्वर से जो संपुर्ण जीवन का स्रोत है, उससे अलग होना है।
भविष्य में आपके द्वारा किये अच्छे कार्य, आपके पिछली बुराईयों के लिये प्रायश्चित नहीं हो सकते। पाप, हमारे लिये परमेश्वर के नियमों का कर्ज है। यदी हम देश के कानुन का उल्लंधन करें, जैसे सरकार को टैक्स (कर) न देने के विषय, तो भविष्य में टैक्स देने की प्रतिज्ञा के द्वारा हमारी गलती माफ नहीं की जा सकती। यदी हम भविष्य में टैक्स देते भी रहें तौभी हमें पिछले कर्ज को तो अदा कर्ना ही होगा। पाप के विषय भी यहीं बात लागु होती हैं।
हम भविष्य में चाहे कितने भी अच्छे कार क्यों न कर लें, फिर भी हमें पिछले पापों का कर्ज चुकाना ही होगा।
इसके अलावा, बईबिल कहती है "हमारे धर्म के काम सब के सब परमेश्वर की द्रश्टि मे मैले चिथड़ों के समान है" (यशायाह 64:6)।
परमेश्वर अच्छे कार्यों की प्रशंसा करता है। परंतु हमारे भले कार्य भी उसकी पवित्रता के मापदंड पर पूरे नहीं उतरते क्योंकि वह असीमित रूप से पवित्र है। इसलिये हम आशाहीन स्थिति में हैं, क्योंकि हमारे अच्छे कार्य किसी फायदे के नहीं है। कोई ऐसा मार्ग नहीं जिसमें हम परमेश्वर की उपस्थिति में जा सकें। हम आशाहीन तरीके से खोए हुए हैं।
परंतु परमेश्वर ने उसके महान प्रेम के कारण एक मार्ग निकाला जिसके द्वारा हमारे पाप क्षमा किये जा सकते हैं।
परमेश्वर इतना जटिल है कि उसे पूरी तरह समझ पाना मनुष्य की समझ के बाहर है। बाइबिल बताती है कि परमेश्वर एक है, परंतु फ़िर भी उस एक में तीन व्यक्तियों का समावेश है - जिन्हें हम पिता, पुत्र (जिसका अर्थ यह है कि उसका स्वभाव पिता का सा, परंतु यह नहीं कि वह पिता से जन्मा) और पवित्र आत्मा - सभी एक दुसरे के तुल्य।
हम मनुष्यों के विचार में इस बात को समझ पाना कठिन है कि तीन भिन्न व्यक्ति, किस प्रकार एक परमेश्वर हो सकते हैं। हम व्यक्तियों को अलग शरीरों के रूप में होने को समझ सकते हैं। हमारी सोच सीमित है। वह परमेश्वर के मिक्षित स्वभाव को नहीं समझ सकती।
जिस प्रकार एक कुत्ता, मनुष्यों के समान बातों को समझ्ने में असमर्थ है, उसी प्रकार हम मनुष्य भी परमेश्वर के विषय कई बातों को समझ पाने में असमर्थ हैं। हम केवल उन्हीं बातों को समझ सकते हैं जो परमेश्वर हमें बाईबिल में से समझाना चाहता है। उससे अधिक नहीं।
उदाहरण के लिये, आप एक कुत्ते को उसके सामने तीन हड्डियां रखकर यह समझा सकते हैं कि 1+1+1=3 होता है और उसे गिनकर दिखा सकते हैं। परंतु उसे यह समझाने की कोशिश कर सकते हैं कि 1x1x1=1 होता है?
आप यह पाएंगे कि अत्यंत होशियार कुत्ता भी इस बात को समझ नहीं पाएगा। परंतु हम पनुष्य यह जानते हैं कि, तीन ’एक’ मिलकर भी ’एक’ ही होते है, उन्हें आपस में गुणा भी कर दिया जाए तो भी।
अब परमेश्वर भी हमसे बहुत ब़ढकर है जितना हम एक कुत्ते से ब़ढकर हैं। गुणा करने की क्रिया को समझने के लिये कुत्तेको मनुष्य बनना पड़ेगा। हम भी यदि परमेश्वर को समझना चाहते हैं तो हमें भी अपने आपमें परमेश्वर के समान बनना होगा।
इस्लिये यदी हम यह नहीं समझ पाते हैं कि परमेश्वर तीन व्यक्तियों से मिलकर है और फिर भी एक ही परमेश्वर है तो यह आश्चर्यजनक बात नहीं है। यद्यपि यह इस बात को समझ नहीं पाते फिर भी यह जानते हैं कि यह सत्य है क्योंकि उसका वचन ऐसा ही कहता है।
कुद मामलों में, कई लोग मानवीय तर्क करते हैं कि यदि परमेश्वर हर जगह हैं तो वह हर मनुष्य में, जानवर में, पौधों में, और हर आराधनालय में होगा। यह छोटी सोच वाले मानवीय विचारों के लिये तर्कपुर्ण हो सकता है जिन्हें ईश्वरीय सत्य का ज्ञान नहीं। परंतु यह पूर्णतया झूठ है। परमेश्वर हर जगह विद्यमान है का यह अर्थ है कि वह हर जगह में होने वाली बातों को जानता है। यद्यपि वह यह भी जानता है कि वहां क्या हो रहा है।
नकृ का सही अर्थ (पापियों की अनंतकालीन सजा) है ऐसी जगह जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति नहीं। यही कारण है कि नर्क में पापियों का क्लेश असहाय हो जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर निश्चित रुप से हर किसी में नहीं रहता। मानवजाति को पाप की अनंत सजा से बचाने के लिये परमेश्वर ने 2000 वर्ष पहले अपने पुत्र को पवित्र आत्मा के ईश्वरीय कार्य द्वारा एक कुंवारा के माध्यम से बालक के रुप में जन्म लेने के लिये भेजा। उसका नाम यिशु मसीह रखा गया।
वह बचपन से होकर व्यसक बना जिसके दौरान उसे उन्हीं परिक्षाओं से होकर गुजरना प़डा जिससे हर व्यक्ति को गुजरना पडता है। और वह उन सभी परीक्षाओ में वह विजयी रहा। उसने कभी पाप ही नहीं किया।
परमेश्वर पिता ने यीशु मसीह को 33 वर्ष की आयु में दुष्टों के हाथों पड़कर क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिये अनुमति दिया। क्रूस पर वह हमारे लिये श्रापित हुआ और मनुष्य जाति के पापों को अपने ऊपर लिया। वहा हम परमेश्वर के महान प्रेम को देखते हैं।
निम्नलिखित दो सत्य से यह सिद्ध होता है कि एक ही परमेश्वर है, और यीशु मसिह के द्वारा परमेश्वर का एक ही बार इस प्रथ्वी पर प्रगट हुआ।
1) केवल यीशु मसीह ही यह एक व्यक्ती है जो संसार के पापों के लिये मरा।
2) यीशु मसीह केवल वही एक व्यक्ती है जो म्रतकों में से जीवित हुआ और दुबारा फिर कभी न मरेगा - इसके द्वारा यह सिद्ध किया कि उस्ने मनुष्य के सबसे बड़े दुश्मन म्रत्यु पर विजय प्राप्त कर लिया है।
चालीस दिनों पश्चात् यीशु स्वर्ग लौट गया जहाँ वह आज भी है।
स्वर्गारोहण से पहले उसने प्रतिज्ञा की कि वह एक दिन संसार का न्याय करने और धर्म और शांति के साथ राज्य करने वापस आएगा।
जब हम उन चिन्हों को इस समय देखते हैं, हम जान सकते हैं कि मसीह का दोबारा आगमन बहुत ही निकट है।
इससे पहले कि यह इस प्रथ्वी पर लौटे, आपको परमेश्वर द्वारा मसीह में पापों की क्षमा प्रप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पशचाताप के विषय वास्तविक सत्य
हमने देखा कि पाप की सजा आत्मिक म्रुत्यु है - अर्थात परमेश्वर की उपस्थिति से हमेशा के लिये अलग किय जाना। यही अनुभव यीशु के क्रुस पर हुआ। वह अपने पिता द्वारा छोड़ दिया गया था।
नर्क की जो दुख-दर्द और तकलीफ़ें हमें भोगना था उन्हें यीशु ने हमारे बदले सहा - और क्रुस पर तीन घंटे के दौरान उनसे जो परमेश्वर है और स्वयं में अनंत है पिता से अलग होने की तकलीफ़ को अनुभव किया।
हमारे पापों कि सजा उनसे ले लिया। परंतु हमें तब तक माफ़ी नही मिलती और सजामुक्त नहीं हो जाते जब तक हम उसे परमेश्वर से प्राप्त नहिं कर लेते।
यही कारण है कि संसार में बहुत से लोग परमेश्वर द्वारा क्षमा प्राप्त करते हैं यद्यपी मसीह उनके लिये मरा।
मसीह केवल मसीहियों के पापों के लिये नहीं परंतु समस्त संसार और हर धर्म के लोगों के लिये मरा।
मसीह की म्रुत्यु के द्वारा परमेश्वर ने आपके लिये जो कुछ मोल लिया है उसे पाने के लिये सर्वप्रथम आपको आपके पापों के विषय पश्चातात करना होगा। इसका अर्थ यह है कि आपको आपके पापी मार्गो के विषय सचमुच खेद है और आप अपने पापों से जिन्हें आप अच्छी तरह जानते हैं फ़िरना चाहते हैं।
परमेश्वर को क्या प्रसन्न करता है क्या नही इसके विषय आरभं में आपका विवेक जाग्रुत नहीं होता। इसलिये परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाली सभी बातों से फ़िरना आपके लिये संभव नही होता। और परमेश्वर इसकी मांग नही करता वह यर्थातवादी है। वह चाहता है कि आप उन सभी बातों को जो उसे अप्रसन्न करती है छोडने के लीये तैयार रहें।
आप उन बातो को छोडने के द्वारा शुरुवात कर सकते हैं जीनके विषय आपका विवेक आपको दोषी ठहराता है। आपको अपनी बुरी आदतों को छोडने की हिम्मत नहीं होगी। ऐसी परिस्थिति में भी परमेश्वर आपकी कमजोरी को अच्छी तरह समझता है। वह आपसे बहुत बलवान होने की उम्मीद नहीं करता। वह आपसे केवल यह पूछ्ता है, "क्या आप उन आदतों को छोड्ने के लिये तैयार हैं?" जब वह आपकी इमानदारी को देखता कि आप सभी पापमय बातों को छोड्ना चाहते हैं, वह आपके उसी अवस्था में स्वीकार करता है, यद्यपि आप अब भी कई बुरी बातों को छोड पाने में पूरी तरह सफ़ल नहीं हुए हैं। यह कितनी अच्छी बात है।
इस बात क एक प्रमाण कि आप बुरे मार्गो को छोड्ने के इच्छुक हैं यह है कि आप बीते दिनों में की गई गलतियों को सुधारना चाह्ते हैं। और इस विषय भी परमेश्वर आपकी सीमाओं को समझता है।
पिछ्ले दिनों में आपने ह्ज़ारों पाप किये होंगे जिन्हें आप अथक प्रयत्नों द्वारा भी सुधार नहीं पाएंगे। परमेश्वर चाहता है कि आप गलतियों को अपनी योग्यतानुसार सुधारें।
उदाहरण के लिये, यदि आपने किसी व्यक्ति के पैसे चुराए हों, तो आपको बचत करके उर पैसे को वापस लौटाने के लिये तैयार रहना चाहिए। यदि आपने अपने शब्दो के द्वारा किसी को दुखित किया हो और यह बात आपको याद हो तो आपको जाकर (या लिखकर) उन बातों के लिये संबंधित व्यक्ति से माफ़ी मांगने के इच्छुक होना चाहिए। इसी प्रकार के कार्यो द्वारा परमेश्वर आपकी ईमानदारी और नम्रता को परखता है। वह नम्र लोगों की ही सहायता करता है। और बिना परमेश्वर की सहायता के हम बचाए नहीं जा सकते।
सच्चे पश्चाताप को बाइबिल "मूरतों की ओर से परमेश्वर की ओर फ़िरना बताती है" (1 थिस्सा. 1:9)।
परमेश्वर मूर्तिपूजा के हर रूप से घृणा करता है। यह सृजी गई वस्तु को सिरजनहार से बढ्कर महत्व देना है - चाहे वह धन, सुंदर स्त्री, या मान-सम्मान हो। सिरजी गई किसी भी वस्तु का चुनाव मूर्तिपूजा है - क्योंकि ऎसे करने का अर्थ है सिरजनहार के बढ्कर सिरजी गई वस्तु की पूजा करना और वही पाप की जड है।
मूर्तियां भी लकडी, पत्थर या धातु की बनी प्रतिमाएं हैं। मनुष्य के द्वारा बनाई गई मूर्तियां उन्हें दर्शाते हैं जिस ईश्वर की वे पूजा करते हैं। परंतु किसी भी व्यक्ति के लिये एक चित्र या मूर्ति बनाना जो सिरजनहार से मेल खाती हो असंभव बात है।
परमेश्वर का स्मरण करने के लिये हमें किसी मूर्ति या चित्र का ’सहायक’ के रूप में उपयोग नहीं करना चहिये। जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि वे मूर्ति या चित्र द्वारा उन्हें परमेश्वर को याद करने में सहायता होती है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का स्रुष्टि के किसी भी चीज में प्रतिमा बनाना परमेश्वर को नीचा दिखाना, अपमान करना है - चाहे वह प्रतिमा पुरुषों, स्त्रियों या किसी पशुओं के रुप में हो।
परमेश्वर खुली आखों से नहीं दिखता, वह किसी मुर्ति की तुलना से कहीं बढकर महान है - चाहे वह कितनी भी अच्छी तरह से क्यों तराशी गई हो। किसी भी परिस्थिति में हमे किसी ऎसे भौतिक वस्तु की जरुरत नहीं जो हमें परमेश्वर की याद दिलाए क्योकिं हम सब के पास विवेक है जो रात-दिन लगातार हमसे बातचीत करता है और हमें सिरजनहार के विषय याद दिलाता रहता है। अधिकतर, मूर्तिपूजा, धार्मिक कार्यक्रम और तीर्थ यात्रा विवेक की आवाज़ सुनने के पर्याय बन जाते हैं।
जब लोग परमेश्वर के नियमों का उल्लंघन करते और भविष्य में भी करते रहते हैं तो वे कई धार्मिक अनुष्ठानों और कार्यो के माध्यम से उनके विवेक की आवाज को दबा देते हैं। वे सोचते हैं कि उनके कई बलि और तिर्थयात्राओं के कारण परमेश्वर उनके बहुत से पापों को माफ़ कर देगा। परंतु यह एक भ्रम है। परमेश्वर हमारे अनुष्ठानों और धार्मिक कार्यो को नहीं देखता। वह हमारे ह्र्दयों को जांचता है कि हम अपने विवेक की आवाज़ को सुनते हैं या नहीं।
इसलिये पश्चाताप हर रीति में मूर्तिपूजा से फ़िरने को बताता है। सच्चे पश्चाताप का अर्थ है कि हम हर सिरजी गई वस्तु से सिरजनहार की ओर फ़िरते हैं, उससे यह कह्ते हैं, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, केवल तू ही आराधना के योग्य और सेवा करने के योग्य है। सिरजी गई वस्तुओं की आराधना करने के कारण मैं खेदित हूं। अब से अंत तक तू ही मेरे जीवन में सर्वश्रेष्ठ होगा।"
परमेश्वर चाहता है कि हम सबके परिवार होवें और हमारे जीवन निर्वाह के लिये कार्य करके कमाएं। पैसा कमाना पाप नहीं है। परंतु परमेश्वर से बढ्कर पैसों के प्रति प्रेम पाप है। आधुनिक सभ्यता की देन के रुप में मिलने वाली सुख-सुविधाओं का उपयोग पाप नहीं है। परंतु उन सुख-सुविधाओं के प्रति परमेश्वर से बढ्कर प्रेम और लगाव पाप है।
परमेश्वर ने हमारे शरीरों को कुछ इस प्रकार बनाया है कि हम भोजन, नींद और यौन समाधान का अनुभव कर सकते हैं। ईनमें से कोइ भी बात गलत नही है।
अब हमें यौन संबंधी इच्छाओं के प्रति शर्माने की जरुरत नहीं बल्कि हमें इस वास्तविकता के प्रति शर्माना चाहिये कि हम अक्सर भूख और थके हारे महसूस करते हैं। परंतु भूख के समय हमें भोजन चुराने या काम पर थकने के कारण सोते रहने की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार हमारि यौन इच्छा की पूर्ति के लिये किसी दूसरे व्यक्ति के साथ ज्यादती नहिं करना चाहिये। परमेश्वर ने विवाह का पवित्र बंधन दिया है - वह चाहता है कि एक पुरुश की एक पत्नि हो - ताकी यौन इच्छा पुरी हो सके। विवाह से ह्टकर किसी भि प्रकार का यौन संबंध पाप है। हमें यौन संबंधी सभी पापों से फिरना चाहिये, उन्हें छोड़ना चाहिये और ईमानदारी से परमेश्वर की ओर फिरना चाहिये।
दुसरा पाप जसके विषाय आपको पश्चाताप करना और छोड़ना है वह है दूसरों को माफ न करने की प्रव्रुत्ति। यदि पापों को माफ करें तो आपको उन सारे लोगों को माफ करने के इच्छुक होना चाहिये जिन्होंने किसी भी तरीके से आपको नुकसान पहुंचाया हो। जैसा परमेश्वर ने आपके साथ किया है वैसे ही आपको दूसरों के साथ करना चाहिये। यदि आप ऐसा नहिं करना चाहते तो परमेश्वर आपको भी माफ नहीं करेगा।
प्रभु यीशु मसीह ने कहा, "यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा"(मत्ती 6:15)।
जिस ने आपको अत्याधिक दुख दिया है उसे माफ करने में आप बहुत कठिनाई महसूस करेंगे। तब आप परमेश्वर से प्राथना कर सकते हैं कि उस व्यक्ति को माफ करने के लिये वह आपकी मदद करे।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सामर्थ आपकी मदद करने के लिये उपलब्ध है। यदि परमेश्वर अपनी सामर्थ द्वारा आपकी मदद करे तो आपके लिये कुछ भी करना असंभव नहिं है।
हमारे पाप चाहे जितने भी बुरे क्यों परमेश्वर उन सब को माफ कर सकता है- यह तभी हो सकता है, यदि हम उनके लिये पश्चाताप करें, यदि हम अपने पापों के लिये सचमुच खेदित हों और पिछ्ले पापमय मागों को छोड़ने के लिये तैयार हैं।
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