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दैविक लेख - ARTICLES

पिछले कई दशकों में वर्तमान समय की जरूरतों एवम आवश्यकताओं को संबोधित करते हुए लिखे गये यह "संक्षेप लेख" है |
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आश्चर्यजनक तथ्य - जैक पूनन

1. ब्रह्मांड के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य

हम परस्पर वैज्ञानिक प्रगति के युग में जी रहें है | इस पीढ़ी में हमने मानव जाती को वेह सब हसिल करते हुए देखा है किसे हमरे पूर्वज असंभव मानते थे|

जिस गति से विज्ञान प्रगति करता आ रहा है उस से यह अनुमान लगाया जा रहा है की, सृस्ती से लेकर कर (ई: पु) सन 1750 जो भी वैज्ञानिक ज्ञान मनुष्य ने एकत्रित किया है वेह मात्र 150 सालों में (1750 से 1900) अस्चर्याजनक रूप से दौगुना हो गया है | वैज्ञानिक ज्ञान का जो स्थर सन 1900 में था वेह फिर से दौगुना हुआ और इस बार मात्र 50 सालों में सन 1950 तक |यह ज्ञान अगले 10 वर्षों सन 1950-1960 में फिर से दौगुना हुआ तत्पश्चात यह अनुमान लगाया जा रहा है की मनुष्य द्वारा एकत्रित यह वैज्ञानिक ज्ञान प्रतिएक दो से ढाई सालों मैं निरंतार दौगुना होता चला जा रहा है|

उद्धरण के तौर पर यात्रा की गति को मनुष के वैज्ञानिक ज्ञान का पैमाना / मापदंड रख ले तो हम पायेगें की |मात्र 200 वर्ष पूर्व मनुष्य यात्रा हेतु घुड़सवारी का प्रयोग किया करता था ठीक उसी तरह जिस प्रकार उनके पूर्वज हाजारों साल पहले किया करते थे | परन्तु सन 1900 के आते-आते मनुष्य उन्नत तरीकों से एवं तीव्रता से साथ प्रति घंटे, 80 किलोमीटर की गति से यात्रा करने में सफल रहा| और उन दिनों 80 किलोमीटर, प्रति घंटे की रफ़्तार बहुत तेज गति मन जाता था | सन 1945 तक विमान के आगमन से वायू यात्रा संभव हुई जिसके चलते मनुष्य एक हज़ार किलोमीटर प्रति घंटे की तेज़ी से यात्रा कर पया, और आज मनुष्य 40,000 किलोमीटर प्रति घंटे के रफ़्तार से अधिक तेज़ी से अंतरिक्ष में सफ़र कर रहा है|

हमारा कथन यह है की चाँद पर पहुच कर हमने अंतरिक्ष पर विजय प्राप्त कर लिया है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चाँद सिर्फ अंतरिक्ष के किनारा पर है |अंतरिक्ष इतना विशाल है कि हमारी कल्पना भी लड़खड़ाहट |

चाँद से धरती की औसत दूरी 400,000 की.मी है |और यह दूरी बहुत ही कम होगी जब हम इसकी तुलना धरती एवं सूर्य की दूरी से करें जो धरती लगभाग 150 करोड़ की.मी की दूर पर स्तिथ है |यह दूरी बहुत ही भव्य दिखाई दे सकती है परन्तु जब हुम इसकी तुलना धरती से स्थित निकटतम सितारे से करेगे तो यही दूरी बहुत ही नगण्य होगी |

सितारों के बीच दूरी के गणना करने के लिए हम उन मानकों/मापदंड का प्रयोग नहीं करते जिसका इस्तिमाल हम साधारणता अन्य दूरियां मापने के लिए करतें है क्यों की,जो परिणाम इन मानक/मापदंडों के इस्तिमाल से हाज़िल होंगे वह निहाती विलाक्षित/ऊटपटांग एवं भविय होंगे | इसीलिए वैज्ञानिकों और खगोलविदों इस प्रकार की दूरियां को मापने के लिए जिस मानकों/मापदंडों का प्रयोग करते है उसे "प्रकाश वर्ष" कहते है- "प्रकाश वर्ष" का तात्पर्य प्रकाश/रौशनी द्वारा एक वर्ष में तय की गयी दूरी से है | आपको याद दिलाना चाहेंगे की प्रकाश/रौशनी लगभग 300,000 की.मी प्रति क्षण/पल की रफ़्तार से दौडती hai (या हर पल पृत्वी के 7 चक्कर) इसके हिसाब से एक वर्ष में प्रकाश (Light) 9000 बिलयन की.मी (9000 billion kilometers) की दूरी तय कर लेता है|

आईये हम सितारों के बिज़ के दूरी को देखतें है| बिना किसी मदद से हम, हमारे निकट स्तिथ जिस सितारे को अपनी आँखों से देख सकतें है उसका नाम है "अल्फा-सन्तौरी" ("Alpha Centauri" ) है वेह धरती से साढ़े चार (4.5) "प्रकाश वर्ष" की दूरी पर स्तिथ है, यह दूरी पृथ्वी एवं सूर्य के दूरी की तुलना में 250,000 बार से भी अदिक है| इसका मतलब यह है की अगर आप प्रकाश की रफ़्तार से यात्रा करेंगे तो चाँद पर पहुचने के लिए एक पल का समय लगेगा, ओर सूरज पर आप 8.5 मिनट में पहुच जायेंगे पर याद रखये की हमारे निकटतम सितारे "अल्फा-सन्तौरी" ("Alpha Centauri" ) तक पहुचने के लिए हमें 4 वर्ष ओर 6 महीने का वक़्त लगेगा | आएये हम इस दूरी को ओर बेहतर रूप से समझे, ब्रमांड के भव्यता का विचार करते हुए एक मानक/पैमाने की रचना करेहें तो पायेगें धरती का प्रतिनिधित्व एक "रेथ का कण" करेगा ओर 3 फीट की दूरी पर सूर्य का प्रतिनिधित्व एक कंच्चे (कांच की गोली) करेगा, हमारे सौर मंडल में उपस्तिथ सरे ग्रहें 100 फिट के दूरी में समां जायेगें| ओर ब्रह्माण्ड के इस (मॉडल) पेमाने पर चलेगें तो पायेगें की हमरे निकटतम स्थित सितारा "अल्फा-सन्तौरी,धरती से 150 मील की दूरी पर होगा |

बीना किसी सहायता से हमे जो सितारा नज़र आता है वेह है "अन्द्रोमेदा आकाशगंगा" जिसकी दूरी धरती से 1.5 मिलयन प्रकाश वर्ष होगी | दूर-बीन की सहायता से आज इसे आकाशगंगा का पता चला है को प्रुध्वी से 6,500 मिलयन प्रकाश वर्ष (6,500 million light years) दूर स्थित है |

आइये हम कुछ सितारों के विशाल आकारों पर नज़र डालें | पृथ्वी से यह बहुत छोटे नज़र आतें है और बच्चे इन्हें जग-मग जग-मग सितारे कहकर पुकारते है और इन सितारों की तुलना में हमारी पृथ्वी काफी बड़ी दिखाए देती है ! इस धरती पर हमें एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाने केलिए काफी समय लगता है | परन्तु पृथ्वी के मुकाबले सूरज इतना विशाल एवं बड़ा है की अगर सूर्य को खोकला कर दिया जाये तो पृथ्वी उस खोकले स्थान पर लग भाग 10,00,000 बार समां जाएगा | मगर फिर भी सूरज सितारों की तुलना में काफी छोटा है | कुछ सितारों आकर में इतने विशाल/बड़े है की अगर इन्हें खोकला कर दे तो सूरज इनमे 500 मिलयन (500 million )बार समां जाये|

बेतेल्गयूसे नामक यह सितारा जो पृथ्वी से 520 "प्रकाश वर्ष"(light years) की दूरी पर स्थित है,यह सितारा 'ओरियों बेल्ट" (Orion belt) का एक उज्वल सितारा है | इसका व्यास 500 मिल्लिओं की.मी है-इसका मतलब यह की अगर इस सितारे "बेतेल्गयूसे"("Betelgeuse") को खोकला करदें तो पृथ्वी इस सितारे के भीतर उसी तरह चक्कर लगा सकती है जिस प्रकार वेह सूर्य के इर्द-गिर्ध अपने गृह-कक्ष में चक्कर लगता है| याद रखिये पृथ्वी का सूरज के चारों ओर चक्कर लगाने का व्यास मात्र 300 मिल्लिओं की.मी है|

आईये हम इन सितारों की संख्या के बारें में जाने |हमारा सौर्य-मंडल जिस "आकाशगंगा" हिस्सा है उसे "milky way " कहते है | खगोल शास्त्रियों के अनुसार इस आकाशगंगा में कम से कम 100,000 सितारें मौजूद है | जिस में सूरज मात्र एक सितारा है और हमारा आकाशगंगा("milky way") अनेक आकाशगंगाओं में मात्र एक सितारा | खगोलशास्त्री हमें बतातें है की इस अंतरिक्ष में लग-भाग 100 करोड़ आकाशगंगा मौजूद है जिसे हम दूरबीन की सहायता से देख सकतें है | और इनके आगे ओर भी अधिक आकाशगंगाएं मौजूद है |

गौरकरने की बात है की ,किस सटीकता से यह खगोलीय पिंड /स्वर्गीय वस्तु (Heavenly Bodies ) अपने ही कक्षयों (Orbits) में सही सही चक्कर लगा राहें है | मानव द्वारा तैयार किये सबसे सटीक घद्दी भी ब्रह्माण्ड में अपने कक्ष में यात्रा कर रखे सितारों से तुलना नहीं की जा सकती है |निश्चित रूप से प्रतिएक सितरों और ग्रहों की रचना एवं उनके परिचालन के पीछे एक सर्व-ज्ञानी रचनाकार की योजना मौजूद है, जिसने प्रतिएक ग्रहों एवं सितारों की योजनाबद्ध तरीके से जिनका सृजना और रचना किया |

ब्रह्माण्ड कितना विशाल है और मनुष्य कितना छोटा | बायबल के एक लेखक ने कुछ इस प्रकार वर्णन किया है, "रात के आसमान मे जब में इन सितारों को देखता हूँ तो यह सोचने में मजबूर हे की परमेश्वर मुझ जेसे अदने और छोटे आदमी पर ध्यान क्यों देता है " फिर भी परमेश्वर जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है वेह प्रतिएक व्यैक्ति के विषय में परस्पर ख्याल करता है | ओर इस अद्भुत सच का खुलासा बायबल करती है |

किसी भी वास्तु का मोल उसके आकर द्वार निर्धारित नहीं किया जा सकता | एक करोडपति कई 100 एकड़ भूमि का स्वामी हो सकता है परन्तु उसका पुत्र उसके लिए उन सब सम्पतियों के मुकाबले अधिक मूल्यवान होगा | ठीक वेसा ही परमेश्वर के साथ भी है अंतरिक्ष चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो | सितारों का आकर कितना भी बड़ा क्यों न हो परन्तु परमेश्वर इन सब से अधिक मनुष्य से प्रेम एवं दुलार करता है | मनुष्य की रचना इसलिए की गयी की वेह परमेश्वर का सन्तान कहला सके और परमेश्वर के साथ साहचर्य कर सके | परमेश्वर के संन्गति/साहचर्य से ही मनुष्य को अपने असली अर्थ एवं अस्तितव का बोध कराता है

पर्मेश्व्सर के महानता का एहसास उनके रचे इस सृस्ती से होता है ,परन्तु बायबल इस बात का खुलासा करती है की परमेश्वर मानुष से भी प्रेम कर उसकी लिए परवाह करता है

2. मनुष्य के विषय में आश्चर्यजनक तथ्य

मनुष्य परमेश्वर द्वारा रचित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ताज है | ब्रह्माण्ड में स्थपित अत्भुद सितारों से भी अधिक आचार्याजनक है परमेश्वर द्वारा मनुष्य की रचना| आइये सर्वप्रथम हम अपने शारीर की ओर नज़र डालें ओर देखे के किस अदभुध रीती से परमेश्वर ने शारीर रचना की है |

चिकित्सकों के अनुसार मानव के मस्तिष्क में करीब 30 अरब तंत्र कोशिकाएं मोजूद है और प्रतिएक अपने संचालन हेतु विद्युत खिंचाव (voltage) का दसवां हिसा का इस्तिमाल करती है | जिनकी उम्र 35 साल से अधिक हो चुकी है वेह प्रति दिन 1000 कोशिकाए गवां देते है और मस्तिष्क इन कोशिकाओ को पुनः प्रतिस्थापित नहीं करता फिर भी जीवन भर मस्तिष्क द्वारा निष्पादित प्रमुक कार्य सुचारू रूप से चलते रहते है- यद्यपि मनुष्य के पांच इंद्रियों की संवेदनशीलता पर मामूली फर्क पड़ता है |

क्या आप जानतें है की हमारे आँखों को दृष्टी प्रदान करने हेतु 130 मिलयन (130 million) छोटे-छोटे स्वेद एवं श्याम (Black and White) चढ़ लगे हुए है और रंगीन दृष्य (Colour Vision) के लिए 7 करोड़ चढ़ लगे हुए है ? और यह 300.000 तंत्रिका तंतुओं (300,000 nerve fibres) द्वारा मस्तिष्क से जुड़े हुए है ,.मानव आँखे एक साथ 15 लाख संदेशों को एकत्रित करता है | अगर हम इसकी नक़ल तकनीकी यंत्र द्वारा करना चाहें तो हमें 25000 टी वी ट्रांसमीटरों(Transmitters) एवं रिसेवारों (Receivers) की आवशकता होगी |

हम अपने कानों पर गौर करेंगे तो पायेगें के इसमें मौजूद श्रवण यंत्रिका की लबाई तीन चौताई इंच है और इसका व्यास पेंसल की नौक जितना होगा , परन्तु इसमें 30,000 विद्युत सर्किट (Electrical Circuits) समाये हुए है| अगर हमे अपने कानों की तुलना "पिआनो वाध्य यंत्र" (Piano) से करेगे तो पायेंगे की पिआनो में 88 चाबियाँ(88 keys)होती है किसके मुकाबले में हमारी अंदरूनी कान में 1100 चाबिय मौजूद है,दुसरे शब्दों में हम कह सकते है यह इतने संवेदनशील होते है की पिआनो वाध्य यंत्र के किसी भी 2 दो चबियौं के बिच यह 12 प्रकार के विभिन स्वर (tone) के अंतर को पहचान सकते है |

अब हृदय एवं रक्त वाहिकाओं को देखें , आम तोर पर हम इनके बारें में तब तक नहीं सोचतें जब तक इनसे कोई की तकलीफ नहीं होती | परन्तु जो ह्रदय परमेश्वर ने हमें दिया है वेह हर साल लग भाग 4 करोड़ बार धड़कता है और वेह भी बिना किसी स्नेहन (lubrication) की सहैयता से ओर बिना किसी अवकाश के | यद्यपि आप इस बात को कभी महसूस नहीं किया होगा परन्तु आज आपका हृदय 1 लाख बार धडकते हुए आपके सर से पैर तक मौजूद 10,000 की.मी से भी अधिक "लाबी रक्त वाहिकाओं" (Red Blood-Cells) से गुजरा होगा | और इसी दौरान आपके शारीर का संचालन द्वारा शतिग्रस्त एवं नष्ट हुए कोशिकाओं (Cells)की पूर्ती के लिए 172 अरब लाल रक्त कोशिकाओं का अतापदन किया होगा | क्या यह किसी चमत्कार से कम है की आप आज जीवित है |

आइये हम "ग्रंथियों"(Glands) पर विचार करें | "थाइरोइड ग्रंथि( Thyroid Gland)" की दैनिक आवश्कता मात्र 1 ग्राम के 5000 वे हिस्से के बराबर है का आयोडीन(नमक) (Iodine) है ,अगर,आपको शिशु प्राय में इस आयोडीन (नमक) (iodine) की सूक्ष्म मात्रा से वंचित रह जाते तो आप मानसिक रूप से विकृत हो जातें|

"पिट्यूटरी ग्रंथि"(pituitary) की तो बात ही निराली है | इस पिट्यूटरी ग्रंथि का दैनिक उत्पादन का वजन मात्र एक ग्राम के दस लाखवाँ हिस्सा है| फिर भी,एक व्यक्ति के बढते हुए वर्षों में इस उत्पान्दन में सूक्ष्म कमी या वृधि हो जाने से वह मनुष्य मानसिक एवं शरीक रूप से विकलागं हो जायेका |आज हमारे स्वस्थ होने का एक मात्र कारन है हमारे भीतर मौजूद इस शारीरिक प्रणाली के अति सुचारू रूप से कार्य करने से संभव हो पाया है|

वाकई, पवत्र शास्त्र में एक लेखक ने इसकी व्याख कुछ इस प्रकार की है "हे परमेश्वर में तेरी स्तुति करता हूँ की तुने मुझे कितने अद्भुद रीती से रचा/बनाया है" मानव शारीर की रचना/निर्माण और परमेश्वर की योगना अनुसार इनमे मौजूद एकदम सटीक संतुलन बेशक यह एक आश्चर्यजनक बात है | मानव शारीर में पाए जाने वाले कुछ अद्भुद बातें जानवरों में भी पाए जाते है|

लेकिन, मानव शारीर के भीतर आत्मा (Soul) वास करती है | यह आत्मा ही एक व्यैक्ति के व्यक्तित्व (Personality) को प्रकट करती है और इस व्यक्तित्व की गठन में शामिल होते है उस व्यैक्ति का "मन"(Mind) उसकी "भावना"(Emotions ) और उसकी "इच्छा" (will) | मन से हम सोचते है ,समजते है और चिंतन करते है, भावनाओं से हम महसूस करतें है एवं, इच्छा हमे निर्णय लेने की शक्ति प्रधान करती है| जानवरों में दिमाग मौजूद होता है ,लेकिन दिमाग का उपयोग कर जानवर तर्क एवं चिंतन करने में असक्षम है| वह सोचने ,समजने और चिंतन करने में असक्षम होते है | केवल मनुष्य ही चिंतन कर सकता है और अपने सोच -विचारों को लिखित रूप प्रदान कर सकता है ओर इस प्रक्रिया द्वारा अपने भावी पीढ़ियों को अपने द्वारा एकत्रित ज्ञान को पारित कर सकता है| जानवर इस कार्य को करने में असक्षम है | पक्षियाँ आज भी अपना घोसला ठीक उसी तरेह बनाती है जिस प्रकार उसके पूर्वक हजारों वर्ष पूर्व बनाया करते थे | मनुष्य की समझ और ज्ञान ही उसके अन्दर मौजूद परमेश्वर की छबि है |

लेकिन मनुष्य में अभी और भी कुछ मौजूद है |मनुष्य के पास न केवल एक अद्भुत शरीर है परन्तु उसके पास शारीर भी अधिक अद्भुत आत्मा (Soul) है | और इस से भी गहराई में मौजोद है "पवित्र आत्मा" (SPIRIT) जो उसके शारीर और आत्मा से भी ज्यादा अद्भुत है | "पवित्र आत्मा की गहराही में हमे बोध कराती है की परमेश्वर निश्चित रूप से मौजूद है | और इस सर्वोच्च परमेश्वर के समक्ष्य हम नैतिक रूप से जवाबदेह है | सृजन /प्रकृति का चमत्कार मात्र परमेश्वर की उपस्तिथि का साबुत नहीं है | हमारे भीतर मौजूद "पवित्र आत्मा" (SPIRIT) भी इसी बात की गवाही देती है |

हमारे शिक्षित एवं सभ्य होना भी परमेश्वर की मौजूदगी की सीख नहीं देता | धर्म भी इस बात की गवाही नहीं देता | अगर आप इस दुनिया के किसी भी जंगल में जाकर किसी असभ्य समाज के जंगली व्यैक्ति से मिलेगें तो पायेंगें की उस मनुष्य में भी परमेश्वर की भावना एवं समझ मौजूद होगी| वह किसी वस्तु या चीज़ की आराधना करते है क्यों की उनके भीतर मौजूद उनकी आत्मा/रूफ उन्हें उस सर्वोच्च परमेश्वर के बारे मैं बताती है जिनके प्रति वेह जिम्मेदार है | उनके भीतर उपस्थित उनका ज़मीर उसे भले अथवा बुरे के बीच के अंतर को जताता है | किसी भी जानवर एवं प्राणी में अपराध की सहज भावना मौजूद नहीं होती | हम किसी जानवर को अपराध बोध के विषय में प्रशिक्षण तो दे सकते है परन्तु उसमें यह भावनाएं सहज रूप से मौजूद नहीं रहती | केवल मनुष्य ही स्वयं अपने अपराध के नैतिक जिम्मेदारी एवं एहसास का अनुभव कर सकता है क्यों की केवल मनुष्य के भीतर उसके रूह एवं अंतरात्मा की आवाज़ मौजूद होती है | यही कारण है की दुनिया भर के मनुष्यों किसी- न- किसी प्रकार का धर्म पाया जाता है | परन्तु आपने कभी भी किसी धार्मिक बंदर या धार्मिक कुत्ते केविषय में नहीं सुना होगा |

मनुष्य का रचना पृथ्वी पर उसके जीवन काल की अवधि के बाद भू किसी काम के लिए रची गये थी | परमेश्वर ने प्रतिएक मनुष्य के भीतर एक उचतम एवं बेहतर लक्ष्य की लालसा उत्पन की है जेसे हम इस पृथ्वी में कभी भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं |

मनुष्य की रचना अनंत काल के लिए की गयी है | मनुष्य जाती के "क्रमगत विकासव" (Evolutionists) में विश्वास रखने वाले वैज्ञानिक एवं पंडितों के अभिप्राय में मनुष्यों एवं प्रनोयों/जानवरों में कोई अंतर नहीं है | फिर भी दुनिया के प्रैतेक देश का क़ानून यही बताता है की एक प्राणी (हाथी) की ह्त्या के मुकाबले एक मानव शिशु की ह्त्या एक जगण्य अपराध है | मानव शिशु के मुकाबले एक हाथी आकर में बड़ा क्यों न हो परन्तु वह बच्चा बेहद ही बहुमूल्य है क्यों की वह स्वयं परमेश्वर की छवि में बनाया गया है | मनुष्य परमेश्वर की सृस्ती का ताज है | मनुष्य की सृस्ती परमेश्वर के संग साहचर्य हेतु की गयी थी |

3. हमारे जरूरतों के विषय में आश्चर्यजनक तथ्य

आज के युग में पूरे विश्व में असंतोष की भावना छाई हुई है खास तौर से युवाओं में | मौजूदा व्यवस्था को उखाड़ फेंक निरंतर कुछ बेहतर एवं नया करने के प्रयास इस बात का प्रमाण है | "क्रांति" इस युग में एक लोकप्रिय शब्द है | क्रांति का अर्थ है बदलाव | हम ऐसे युग में जी रहे है जहाँ पर सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन हो रहा है| फैशन का प्रचालन भी तेजी से बदल रहा है | जो भी आज फैशन में है वह एक साल के पूरा होने तक बदल जाता है | यहाँ तक के व्यापार जगत में क्रांति छाई हुई है | आज विश्व भर में मौजूद उत्पादों में से 65 प्रतिशतउत्पादों का अस्तित्व मात्र 5 वर्ष पहले नहीं था |

आज हमारे चारों ओर बदलाव को देखा एवं महसूस किया जा सकता है | लौग निरंतर कुछ नये और बेहतर पाने एवं करने खोज मैं है | कई देशों में शसस्त्र क्रांति चाई हुई है | पर इन सबके बावजूद हालात बत से बत्तर होते जा रेहें है | आज समाचार पत्र भुखमरी अकाल,बेरोजगारी ,हिंसा,युद्ध ,विनाश ,और मौत की खबरों से भरा पड़ा है|

वर्त्तमान स्तिथि से असंतुष्ट होना कोई बुरी बात नहीं है,अगर हम अपने समाज के लिए कुछ बेहतर मांग करें | हम निश्चित रूप से हमारे समुदाय की बेहतरी चाह सकतें है , हम अपने देश और दुनिया के लौगों की लिए यह चाह सकतें है की वेह किसी भी प्रकार की जरूरतों,मांग और चाहत से मुक्त रहें | प्रतिएक व्यैक्ति के पास रहने के लिए जगह, पहने के लिए कपड़े और खाने के लिए भोजन हो |हम यह चाहतें हें की हमारे देश ओर दुनिया के लौग बेहतर स्वतंत्रता का अनुभव करें | वास्तव में वर्त्तमान परिस्थिथि से संतुस्ट होते हुए मौन रहना अक्सर निर्जीवंता की निशानी होती है | केवल मृत व्यैक्ति ही यथा स्थिति से संतुष्ट रहतें है | कब्रिस्तान में कोई क्रांति नहीं हो सकती है |परन्तु वहां कोई प्रगति भी नहीं हा सकती है |

हम एक स्वतंत्र देश में जी सकते हैं | पर क्या हम अपने निजी जीवन में सच्ची स्वंतंत्र से परिचित है | मनुष्य वैज्ञानिक शेत्र में भले ही काफी प्रगति कर चुका है परन्तु नैतिक रूप से बहुत पिछड़े एवं मंद है | विश्व भर में अधिकांश देश आज स्वतंत्र क्यों न हो लेकिन खुद मनुष्य अब भी बंधनों में जकड़ा हुआ है | भले ही मनुष्य बाहरी रूप से स्वतंत्र क्यों न हो परन्तु अभी भी वेह अपने स्वार्थ एवं इच्छाओं पर विजयी पाने में असमर्थ है पवित्र शास्त्र बतलाती है की "स्वयं अपने इच्छाओं एवं लालसाओं पर राज करना ,किसी देश पर राज्य करने से बेहतर है|

एक क्रांति में शामिल होता है मौजूदा व्यवस्था को उखड फेखना | इस मायने में प्रभु येशु मसिः ही विश्व भर के सब से बड़े क्रांतिकारी थे |फर्क केवल इनता था , बाकि अन्य क्रन्तिकारी बाहरी क्रांति की सीख द्देतें है परन्तु मात्र प्रभु येसु ने आंतरिक क्रांति का पाठ पढाया | प्रभु येसु नेसमस्या की जड़ पर प्रहार किया और सिखाया की मनुष्य को ऐसे क्रांति की अवशाकता है को उसके भीतर होती है |

जब मनुष्य इस भीतरी क्रांति का अनुभव कर लेता है तो बाहरी क्रांति खुद- बा-खुद अस्थिवा में आ जाती है | परन्तु हमें समस्या की जड़ से निपटने की जरूरत है | एक मरीज का इलाज करते हुए चिकित्सक केवल बाहरी लक्षणों का ही इलाज़ नहीं करता, वह उस रोग को ही मिटा देता है |उदाहरण के लिए, एक कैंसर पीडित व्यक्ति- भूख न लगने की शिकायत कर सकता है , कैंसर के इलाज़ न करते हुए मात्र उस मरीज की भूख न लगने की शिकायत का इलाज़ करने वाला चिकित्सक काफी मूर्ख साबित हो सकता है | ठीक उसी प्रकार जो यह सोचतें है की बाहरी क्रांति ही हमारी साड़ी समस्याओं का उचित समाधान है - उस चिकित्सक की मुर्खता को दोहरा रहें है | वह लक्षणों से छुटकारा पाने के प्रयास में लगे रहतें है | परन्तु बीमारी अपने जगह पर स्तिथ है |

मनुष्य के भीतर मौजूद उसके "व्यवस्था क्रम" में एसा क्या है जिसको उखड फेखने की आवशकता है ? आज मनुष्य परमेश्वर के बिना "स्वयं" पर निर्भित होकर एक स्वंतंत्र जीवन जी रहा है |यहां तक कि धार्मिक व्यैक्ति भी कई मायनों में अपने ही स्वार्थ को तलाश्तें है | अपने जीवन की योजना में परमेश्वर को कोई स्थान प्रदान नहीं करतें है | इस व्यवस्था को उखड फेकने का अर्थ एक ऐसे स्तिथि है जहाँ पर मनुष्य निरंतर परमेश्वर पर निर्भरता जीवन जीता है | यही वह "आध्यात्मिक "क्रांति" है जिसे प्रभु येशु मसिः लेकर आये | और यही वह क्रांति है जिसका अनुभव विश्व भर के लोगों को दिलाना चाहतें है |

आइये विचार करें और एक अन्य क्षेत्र में जहाँ क्रांति की आवशकता है | हम सब को अपने माता पिता से विरासत के रूप में "धर्म/धार्मिकता" मिली है | और विरासत के रूप मैं हमें मिली होती है कुछ "पूर्वाग्रहों" (prejudices) और समय बीतने के साथ यह "पूर्वाग्रहों" विकसित होकर ठोस रूप लेने लगती है | दुर्भाग्यवर्ष, धार्मिक मामलों में, अधिकांश मनुष्य स्वयं ,अपनी सोंच पर निर्भित होने की स्तिथि में नहीं रह ते | वह किसी "पादरी" या "धार्मिक व्यैक्ति " की सोंच पर पूरी तरह निर्भर होतें है | हालन की आध्यात्मिक मामलों पर सोंच विचार करने से अधिक "उपयोगी" एवं "फलदायी" गतिविधि और कुछ नहीं हो सकती है | हम यह निर्णय करना चाहिए की परमेश्वर के विषय में "सत्य " का की कोज करेंगे | इस मामले में गलती की कई गुंजाईश नहीं हो सकती |

विचार करें की हमारी स्तिथि क्या होगी अगर हम विज्ञान के शेत्र में अपने सोंच/बुद्धि का इस्तिमाल करना छोड़ दे | अगर मनुष्य यह स्वीकार कर ले की विज्ञान के शेत्र उसके पूर्वजों की सोंच और समझ ठीक है प्रगति संभव नहीं |

उद्धरण के रूप में हम यहाँ देखेगे की किस प्रकार हजारों वर्षों से मनुष्य यह मानता चला आ रहा है की, ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी है और सूर्या एवं तारे इसके इर्द-गिर्ध गूम रहें है | लेकिन, 450, वर्ष पूर्व कोपर्निकस नमक आदमी ने अपने पूर्वजों की सोंच पर सवाल करते हुए इस मान्यता को गलत साबित किया |

विज्ञान की प्रगति मात्र इस लिए संभव हो पाई है, क्यों की वैज्ञानिक आँख बंध कर के अपने पूर्वजों की सोंच को मानें से इनकार करतें है | एक सदी पहले मनुष्य यह मानतें थे की वायु- विमान/उड़ान जेसी कोई चीज़ संभव नहीं हो सकती | आज, लोगों हवाई जहाज द्वारा पूरे दुनिया में यात्रा कर रहे है | इस सदी के शुरुआत में कोई नहीं विश्वास कर सकता था की परमाणु (अनु) का विभाजन संभव है | परन्तु आज यह संभव है |कुछ दशक पहले कोई नहीं सोच सकता था की मनुष्य कभी चाँद पर कदम रखेगा, पा मनुष्य चंद्रमा पर भी उतरे|

पर अफसोस है की धर्म का दायरा ही एक ऐसा स्थान है जहाँ मनुष्य आँख बंध कर के अपने पूर्वजों एवं धर्म-पुजारियों की सोंच पर चलता आ रहा है | अपने बारें में आप क्या कहेंगे ? आपकी धार्मिक प्रतिबद्धता क्या हैं ? क्या वेह केवल पूर्वजों से मिली विरासत है जिसे आप आँख बंद कर पालन करतें आ रहें है | या फिर परमेश्वर और अनंत काल के प्रति खुद आपकी अपनी प्रतिबद्धता है, क्या आपने पूर्वजों से विरासत में मिली सारी दाख्यानुसी एवं ख्यालों सोंच को अपने दिमाग से लिखल फेका है ? क्या इस बात को आप यकीन से कह सकतें है ?

प्रभु यीशु मसीह एकमात्र ही वह महानतम क्रांतिकारी है जिसका दर्शन इस विश्व ने किया है | क्यों की वह मनुष्य में भीतरी क्रांति एवं परिवर्तन लाने हेतु आया | और जब मनुष्य का बदलाव अंदर से हो जाये ,तो फिर इस दुनिया और समाज में मौजोद बुराइयों का उपाय ओर इलाज भी मिल जयेगा | जब तक स्वयं मनुष्य का बदलाव नहीं हो जाता , तब तक इस दुनिया एवं समाज में पाई जाने वाले समस्याओं का समाधान संभव नहीं |

4. हमारी सबसे बड़ी जरूरत के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य

मनुष्य की सबसे महानतम अवशाकता क्या है ? क्या आपने , कभी उसके बारे में सोचा है ? रोटी ,कपडा , मकान या रोजगारी ? इस में कोई संदेह नहीं की हमें इन चीजों की जरूरत नहीं | इन चीजों बे बिना जीना संभव नहीं | शरीर के लिए भोजन की,पहने एवं ओढने के लिए कपडे , आश्रय के लिया मकान की जरूरत और अपने और परिवार के जीवन यापन के लिया रुजगार की जरूरत पड़ती है | हम इनमें से किसी के महत्व का अवमूल्यन नहीं कर सकते | लेकिन भौतिकवादी के जिस युग में आज हम जी रहें है, संभवता मनुष्य को यह भूलने का खतरा रखता है की वह इस युग/समय का नहीं बल्कि अनात्काल का प्राणी है और उसके भीतर परमेश्वर की आत्मा का वास है | इस संधर्ब में आत्मा का मूल्य शरीर की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है | शारीर की जरूरतें महत्वपूर्ण है,परन्तु आत्मा और आत्मा की जरूरतें उन सभों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है |

यदि आपका पालतू कुत्ता बीमार हो जाये तो आप पशु चिकत्सक से उसका इलाज करोगे | अगर उसी समय आपका बच्चा बीमार हो जाये , और आपको चुनाव करना हो की चिकित्सक के पास पहले आपके बच्चे को ले जाएँ या फिर आपके पालतू कुत्ते को .. तो यकीनी, आप पहले आपने बच्चे को चिकित्सक के पास लेके जाऊगे | इसलिए नहीं की कुत्ता कम महत्वपूर्ण है, बल्कि आपका बच्चा कुत्ते के कहीं अधिक महत्वपूर्ण है |

क्या आपने कभी आत्मा के विषय में बिलकुल निष्पक्ष भाव/ पूर्वधारणा (Prejudice ) से सोंचा है ? पूर्वधारणा एक ऐसी घातक मनोशिथि है, जो आपके दिमाग/बुद्धि को अंधा एवं भ्रष्ट कर परमेश्वर के सच्ची समझ एवं संपर्क में आने से रोकती है , उनके सच्चे आध्यात्मिक जरूरतें की समझ और पृथ्वी पर अपने अस्तित्व (में आने) के असली समझ को रोकती है | हमे से कई अपनी सारी जिंदगी अनसुलझी समस्याओं के साथ जीतें है ,क्योकि हम जीवन के प्रति पूर्वाग्रह विचारों और पूर्वधारणा (Prejudice )रवैया अपनातें है |

क्या आप धर्म और अनंत-काल की सच्चाई के विषय में खुले दिमाग से विचार करने के लिए तैयार हैं ? तो आप अवश्य यह पायेगें की कुछ तथ्य एवं धरना जिसे आप हमेशा से सही मानते आ रहें है वेह सचाई से बिलकुल विपरीत है | इससे पहले की हम आगे बढें , कृपया विचार करें की सच्चाई जानने के लिया आप कोई भी मूल्य चुकाने के लिए तैयार है ? अगर सच्चाई जानने के लिया आप वाकई जीने- मरने की हद तक संगीन है, (और उसे कम कुछ भी नहीं) तो पवित्र शास्त्र बतलाती है की, परमेश्वर उन सब को पुरुस्कृत करता है जो सच्ची एवं साफ़ ह्रदय से उसकी (परमेश्वर) तलाश करतें है | किसी भी धर्म को माने वाले आदमी,ओरत या बच्चे ,प्रभु येसु मसिः और परमेश्वर के बारे में सच्चाई जान सकता है, अगर वह एक खुले दिमाग एवं सच्चे दिल से परमेश्वर की तलाश करेगा तो |

एक व्यक्ति के मृत्य हो जाने के पश्चात क्या होता है ? क्या मौत सम्पूर्ण (चीजों) की अस्तित्व की समाप्ति है ? सम्भवता नहीं ! पृथ्वी पर यह जीवन अनंत काल का एक परिचय है | इस पृथ्वी पर हम एक परिवीक्षा (probation ) में हैं और परमेश्वर की नज़र हम पर बनी हुई है | पृथ्वी पर हमारा ये जीवन इस बात को निर्धारित करेगा की हमारा "अनंत काल" किस प्रकार होगा | परमेश्वर प्रतिएक व्यैक्ति के जीवन के विषय में (सम्पूर्ण) असलियत जानता है | भले ही हम अपने परिचातों एवं दोस्तों को अपने बाहरी भलाई / अच्छे होने के दिखावे से उन्हें मुर्ख जरूर बना सकतें है | परन्तु परेश्वर पिता को हम मुर्ख नहीं बना सकतें | उनकी नज़रों में हम सब सामान रूप से दोषी है , और हम उनके उच्चा और पवित्र मानकों की कसोटी पर खरे नहीं उतारते | मनुष्य का रचना इसी लिए हुयी, की वेह के साथ सहभागिता कर सके | ऐसा ना करने की स्तिथि में मनुष्य , पृथ्वी पर अपने प्राथमिक उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम रहता है |परमेश्वर के साथ इस सहचर्य का अनुभव तब तक नहीं भोग सकतें जब तब हमारे ऊपर से पाप का दोष नहीं हट जाता |

हमारे हिसाब से परमेश्वर किस तरेह के हो सकतें है ? दुनिया भर के लोगों का परमेश्वर के विषय में अलग- अलग विचार रखतें है की परमेश्वर तरेह के होसक्तें है | परन्तु कबी भी ,किसी ने परमेश्वर को नहीं देखा | इसीलिए परमेश्वर के प्रति हमारे सारे सोंच- विचार व्यर्थ साबित होंगें | पवित्र शास्त्र बतलाती है की- प्रभु यीशु मसीह स्वर्ग से निचे उतर पृथ्वी पर इसलिए जन्म लिए क्योंकि परमेश्वर को प्रकट कर सकें | वह मनुष्य के रूप में स्वयं परमेश्वर (का प्रकातिकर्ण) थे | यही सत्य है : यीशु मसीह ने परमेश्वर को प्रकाशित (revealed ) किया , एक ऐसे परमेश्वर जो पूर्णता पवित्रता और प्रेम से भरा हुआ है |

किस प्रकार हमारे जीवन से पाप के दोष को हटाया जा सकता है ? बहुत से लोगों अपने जीवन में इस दोष के रहतें एक बड़ी समस्या का सामना करतें है ? और उन्हें इस समस्या का समाधान नहीं मिलता | परन्तु यीशु मसीह "में" इस समस्या का सम्पूर्ण समाधान मौजूद है | वह क्या है ?

केवल पाप से (पर्याप्त) पश्चाताप कर,खेद प्रकट करना मात्र काफी नहीं | मान लीजिये की आप बैंक डकैती के जुर्म से अदालत में दोषी ठहराया गये हो , और आपके पिता उस अदालत के न्यायाधीश थे,माफ़ी मांग लेने एवं पश्चाताप करने मात्र से वह मुझे बरी नहीं कर सकतें | पिता होने के नाते भले ही वेह मुझसे बहुत प्रेम क्यों न करतें हो परतु अभी वह अदालत एक न्यायाधीश की हेसियत से विराजमान है | और इसलिए वह मेरे अपराध का उचित दंद देने हेतु प्रतिबद्ध है| भले ही मुझे उस बात का पश्चाताप हो और बेटें होने के नाते मुखसे प्रेम करतें हो |

अगर आप वीश्वास करतें है की परमेश्वर न्यायपूर्ण है, तो निश्चित रूप से पहचानेगे ही वेह मनुष्य से भी काफी उत्तम है |फिर बिना किसी सजा के वह, कैसे हमें माफ़ कर सकतें है ,मात्र इसलिए कीहमें अपने किये का "पश्चाताप" हो और वह हमें से अपार प्रेम करतें हो | वह न्यायपूर्ण परमेश्वर है , और उचित सजा की मांग करता है |

मेरे पिता होने के नाते वह अदालत में ऐसा कुछ कर सकतें है जिस से मुझे मदद मिल सके | वह न्याय करते हुए यह कह सकतें है की," कानून के अनुसार तुम्हे 10,000 रूपये का जुर्माना देना होगा "| फिर वह 10,000 /- रूपये (अपने खून पसीने की कमाई)देते हुए कहेंगे "बेटे यह पैसे लेकर अपना जुर्माना भरो और अपने सजा से मुक्ति पाओ " आपने देखा उन्होंने क्या किया ? एक न्यायाधीश की हेसियत से उन्होंने अपने बेटे को उचित सजा दी और पिता होने के नाते जुर्माना की रकम का भक्तान भी खुद उन्होंने दिया | परमेश्वर ने भी ठीक ऐसा ही किया | वह सम्पूर्ण मानव जाती से कहतें है "तुम सब पाप के दोषी ठहराए जाते हो ओर पाप की उचित सजा मौत है"- एक न्यायाधीश के रूप में वह हमे यह सजा सुनातें है | परन्तु वह हम से अपार प्रेम भी करतें है और इसीलिए प्रभु येसु मसिः के ज़रिये एक व्यक्ति का रूप इस धरती पर जन्म लिया और खुद की हमारे जुर्माने का भक्तान किया | हमारे अपराध का दंड भोगते हुए प्रभु येसु ने अपने प्राण की बलि दी इस सच्चाई के सबूत का पता हमे इस तथ्य के से मिलता है की, प्रभु यीशु मसीह मृत्यु के 3 दिन पश्चात मृतकों में से पुनः जीवित हो उठा|ऐसा कर प्रभु यीशु मसीह ने मृत्य पर विजय पाई | और आज भी जीवित है |

यह तथ्य हमारे विश्वास करने योग्य है | परन्तु हमे कुछ और भी करना होगा | जब मेरे पिता अदालत में मुझे पैसा दें , और अगर में उसे लेने से इनकार कर दूँ | तो इस हालात में , मेरा सजा से मुक्त होना संभव नहीं | ठीक उसे प्रकार प्रभु येसु मसिः के ज़रिये जो "क्षमा" हमें प्राप्त होती है ,हमें ग्रहण करना चाहिए | अगर हम इसे स्वीकार नहीं करतें, तो हम कभी भी इसका लाभ नहीं उठा सकेंगें | आज प्रभु येसु मसिः के ज़रिये आप उस क्षमा को प्राप्त कर सकतें है | इसे प्राप्त करने का चुनाव आपको करना होगा |

5. लत और हताशा के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य

विश्व भर के सारे लोग जिन चार चीजों के पीछे भाग रहें है वेह है-अभिलाषा/ ऐश, शोहरत , दौलत और शक्ति/ सत्ता |

सबसे पहले इन चार चोजों के जुड़े एक सिधांत को समझ लेना उचित होगा | इस सिधांत को हम " ह्रासमान के विधि" (एवं घटती प्रतिफल का सिधांत) ( Law of "Diminishing Returns") के नाम से जानेगें |

हम अभिलाषा (एवं ऐश) से मिलने वाली ख़ुशी के उद्धरण से हम इस सिधांत को समझेगें | अगर हम छोटे मात्रा में इसका सेवन करें तो आरंभ में अभिलाषा कुछ हद तक संतुष्टि प्रदान करता है | चाहे यह अभिलाषा/संतुष्टि तम्बाकू या नशीले पधार्तों के सेवन करने से , शराब पिने से , रॉक संगीत,अश्लीलता या नाजायज लेंगिक संभंध रखने से मिलती हो | परन्तु एक बार (हम) इनमे में लिप्त जाये है के यह (अभिलाषा) अपने शिकार (addict) पर अपनी पकड़ मजबूत करना शुरू कर देती है जब तक शिकार को इन चीजों की लत न पढ़ जाये | वेह व्यक्ति इन अभिलाषा से होने वाली उतेजना बिना अपना जीवन जेने में असमर्थ रहता है |

आगे चल कर शिकारी को धीरे-धीरे यह एहसास होने लगता है अबिलाषा पाने के लिए उतेजना की मात्र जो उसने पिछली बार इस्तेमाल किया था वही मात्र इस बार उसे संतुष्टि करने में ना-कामियाब रही |पर्तिएक बार उसे अपनी मात्र/खुराक बड़ाकर ही अपने आप को संतुष्टि करना पढता है| यही " ह्रासमान के विधि एवं घटती प्रतिफल का सिधांत " law of diminishing returns" है शराब एवं नशीले पधार्तों के सेवन का लात आगे चल के उस व्यैक्ति के शारीर मन एवं बुद्धि को बर्बाद कर देती है | अश्लील साहित्य एवं दृश्य और नाजाइश लैंगिक संबंधों की लत पढ़ जाने के मामले मेंवेह व्यैक्ति सामान्य मानवीय लैंगिक संबंध से गुज़र कर अमानवीय एवं विकृत लैंगिक संबंध में बदल जाता है और आगे चल के यह प्रविती इतनी विकृत हो जाती है,यहाँ तक की कुछ मामलों में हालात, जानवरों से भी बदतर हो जातें है | प्रत्येक मामले में, शिकार खुद को शिकारी से मुक्तकराने में असमर्थ रहता है | उसकी स्तिथि ठीक वैसे होती है जेसे की एक बढ़ई उपाध्यक्ष के निचे फसे व्यैक्ति की होती है |

संगीत एवं विज्ञानिक जैसे परिष्कृत शेत्र से मिलने वाली अभिलाषा का सवाल है यहाँ भी ह्रासमान के विधि एवं घटती प्रतिफल का सिधांत लागु होता है |

यह सिधांत दौलत, शोहरत, प्रसिधी की लालसा पर सामान रूप से कार्य करती है - उनका शिकार कर उन्हें बर्बाद कर देती है - हालांकि बर्बादी का स्थर नशीले पध्र्तों और लैंगिक लत से होने वाली हानि से कम क्यों न हो |

आईये प्रसिद्धि के तलाश पर विचार करें | इसकी शुरुआत छात्रवास के दिनों से अपने मित्रों के बीज में प्रसिद्ध होने एवं नाम कमाने से शुरू होती है | यहें से शुरू होता है - एक स्तर से दुसरे स्तर तक प्रसिद्ध होने का यह सफ़र- चाहे वेह सनेमा, खेल-कूद,व्यायाम या किसी अन्य क्षेत्र का क्यों न हो | जो व्यैक्ति शहर भर में प्रसिधी पा लेता है - वेह देश भर में प्रसिद्ध होना चाहता है - फिर दुनिया भर में प्रसिद्ध होना चाहता है| प्रसिद्धि पाने के इस दौड़ में मनुष्य अपना शारीर ख़राब कर लेता है इसके साथ स्वयं अपने प्रतिबद्धता (ज़मीर /अन्त्रत्त्मा) के साथ समझोता करने लगताहै , इतना ही नहीं वेह सर्वोच्च स्थान पर पहुचने के लिया वेह दूसरों को एक सीडी के तरह इस्तिमाल कर उनका बर्बाद करने को भी नहीं चुकता | परिणाम स्वरुप अंत में उसे क्या हासिल होता है- ? - निराशा! जब हासिल करने के लिए कुछ नहीं बचता,तो रह जाती है निराशा ! कई फ़िल्मी सितारे ओर अन्य प्रसिद्ध लोग अपने लोकप्रियता के बावजूद आत्महत्या कर लेते है क्यों की अंदर से वेह निराशा होई चुके होते है |

आईये विचार करें किस प्रकार यह सिद्धांत दौलत ओर शोहरत की लालसा पर कार्य करता है | प्रारंभ में, एक व्यक्ति अपने जीविका चलाने मात्र के उद्देश्य से किसी व्यावसायिक उद्यम की शुरुआत करता है | धीरे - धीरे बढ़ते मुनाफे से साथ , वेह पाते है की उसके परिवार के जरूरतों की पूर्ति के बाद भी बहुत सारी दौलत / धन संचित हो गया है | जिसे वेह अपने व्यापार में निवेश करने के लिए विचार करता है | ओर फिर शुरुआत होता है दौलत/शोहरत के पीछे एक अंधे-दौड़ की ,जिसकी समाप्ति की संभावना - कभी मुमकिन नहीं | हालांकि हर मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिया इस दुनिया में पर्याप्त सामग्री उपलभध है ,परन्तु इस संसार की सम्पूर्ण संसाधन एवं सामग्री भी उस मनुष्य के लालच को पूरा करने में असमर्थ साबित होती है | धन ओर भोतिक चीजों में एक व्यक्ति को जकड़ने में ऐसी शक्ति होते है , जिस के चलते उसके जीवन में संतुष्टि होने की भावना कम होती चली जाती है | एक समय भौतिक चीजों का संचय जिस मनुष्य ओर उसके परिवार को खुश रखने में कामियाब हुआ करता था, वही दौलत एवं भौतिक शौरत अब उसे कुश करने में नाकामियाब साबित होती है | ह्रासमान का सिधंथ यहाँ भी लागू होता है| इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, शाही भोजन, दुनिया भर के सैर कर अनेक स्थानों को देखने का रोमांच ,उच्चा (स्थर) सामगिक जीवन.. आदि; जिन्हें वेह दौलत कम कर हासिल कर ले ता है , उसे संतुस्ट करने मैं नाकामियाब साबित होती है | वेह एहसास करता है की जब उसके पास कम सम्पति थी तो वेह ज्यादा खुश रहता था ओर उसका तनाव भी कम हुआ करता था| वह पाता है,उसके वैवाहिक जीवन में खुशी कम हुई है | इस संधर्भ में प्रभु येसु मसीहा के वचन बिलकुल सच साबित हुए है | एक मनुष्य के जीवन का अर्थ और बनावट उसे द्वारा एकत्रित सम्पथी से नहीं मापी जाती है |

आइये विचार करें, के किस प्रकार हास्मान का यह सिद्धांत शक्ति,सत्ता एवं सम्मान की खोज में लागु होता है | चाहे वेह राजनीतिक शेत्र में हो या किसी अन्य दायरे में | उद्धरण के लिया, राजनेतिक शेत्र में एक व्यैक्ति जो मात्र एक बार एक सांसद के रूप में निर्वाचित होने चाहता था , वह सांसद बनने के पश्चात संतुष्ट नहीं होता | अब उसकी नज़र मंत्रिपद पर गडी होती है | वेह अंत में पायेगा की देश का सर्वोच्च मंत्रीपद मिलने का बाद भी वेह निराश और बैचेन है | एक पुरानी कहावत कुछ यूँ कहती है " जिस पर यह मुकुट चड़ने जारहा है उस शीर्ष का नाम है चिंता " जब वेह अनजान / कम चर्चित व्यैक्ति था वेह हत्या के खतरे से परे था | (परन्तु अब नहीं )

ऊपर दर्शाए इन शेत्रों एसा क्यों है ?

हमारे भीतर एक निर्वात /खालीपन (vacuum) मौजोद है - जिसे मात्र (सिर्फ और) परमात्मा ही पूरा कर सकतें है | निरंतर मनुष्य इस खालीपन / खोकलेपन को बहरने का प्रयास अभिलाषा, सम्मान, दौलत एवं सत्ता कमाकर पूरा करना चाहता है | और अंतिम परिणाम हमेशा "निराशा" ही होती है , क्यों की वेह कभी भी संतुस्ट नहीं होता |

पवत्र शास्त्र बतलाती है की परमेश्वर ने मनुष्य के ह्रदय में अनंतकाल को स्थापित किया है | किसी ने इसकी व्याक्य इस प्रकार की है "हमारा दिल तब तक बैचेन रहता है ,जब तक वेह अपनी शांति प्रभु में न खोज ले"|

ह्रासमान के विधि" (एवं घटती प्रतिफल का सिधांत) ( Law of "Diminishing Returns") यह सिधांत स्वयं परमेश्वर ने उन सारी "खोजों "के ऊपर रख छोड़ा है जो इस संसार की नज़रों में उचा एवं आकर्षित दिखाए है | ताकि मनुष्य स्वयं इस बात का एहसास कर सके की वेह अनंतकाल का प्राणी है | वेह एक आध्यात्मिक खालीपन के साथ रचा गया है ,जिसे परमेश्वर की पवत्र आत्मा ही पूरा कर सकती है |

लेकिन जिस प्रकार पानी भरे जाने के पूर्व उस भगोने का साफ़ होना अवशक होता है , ठीक उसी प्रकार परमेश्वर के पवित्र आत्मा को ग्रहण करने से पहले हमारा हृदय का शुद्ध(पाप मुक्त) होना भी आतिअवशक है | प्रभु येसु हमारे ही पापों के लिया मारा गया ताकि हमारे हृदय को पाप से मुक्त कर उसे शुद्ध कर सके |

सच्ची एवं स्थायी संतुष्टि जो हमारे हृदय के समस्त अशांति, निराशा एवं बैचेनी को मिटा दे , तभी मिलती है जब हम प्रभु येसु मसीह को अपने जीवन के हर क्षेत्र में उनके स्वामित्व को स्वीकार लेते है

6. अंतिम निर्णय के विषय में आश्चर्यजनक तथ्य

पृथ्वी पर हमारा जीवन ही सब कुछ नहीं |जीवन का हर पल हमे मृतु की ओर ले जाता (मृत्यु की उलटी गिनती) है | दिन प्रति दिन यह गिनती घटती चली जाती है अंत में एक दिन यह गिनती हमारे कब्र पर जाकर समाप्त होती है | और मृत्य पर, एक अंतरिक्ष विमान की तरह हम विदाई लेतें है | मृत्य क्या है ? यह शारीर का आत्मा और रूह से बिछड़ाना है | यहाँ पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है| हम कहाँ जा रहें है ? क्या आप अपना अंतिम लक्ष्य (गंतव्य) को जानतें है ?

मृत्य उपरांत जीवन (समय), पृथ्वी के इस जीवन की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है | समय की तुलना में अनंत-काल कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है |,हम अपना अनंत-काल कहाँ बिताने वाले है, इस सवाल हम पृथ्वी पर अपना जीवन किस प्रकार और कहाँ बिताने वाले है से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है| एक मुर्ख व्यक्ति ही इनता कमबीन (short-sighted) हो सकता है की वेह केवल अपने पृथ्वी पर इस जीवन के संदर्भ में ही सोचें | एक बुद्धिमान व्यक्ति भविष्य की ओर नज़ारे गढ़ाए अपने आप को अनंत काल के लिए तैयार करता है |

आईये एक उदाहरण के रूप में विचार करें : एक युवक जिसे करोड़ों रुपए की रकम विरासत में मिली हो , बंगलौर शहर में बसने का फैसला करता हो | बंगलौर के रस्ते में जाते हुए कुछ दिन मुंबई में बिताता है | और उन दो दिनों में वेह आपने आप पर दिल खोल कर पैसा उडाता है- वह जूआ खेलता है , और मात्र 2 दिनों में अपनी सारी विरासत गवां देता है | अंत में जब वह बेंगलोर पहुँचता है तो पता है की उसके पास खर्चने के लिया फूटी कौड़ी भी नहीं है और अपने शेष 60 साल सडकों पर भीख मांग कर एक दरिद्रता का जीवन जीता है |

ऐसे आदमी को आप क्या कहेंगे ? निश्चित रूप से "मूर्ख" | पर ठहरिये इस आदमी से भी कहीं जयादा वह व्यक्ति मुर्ख है जो "अनंत काल" की उपेक्षा कर मुर्खतापूर्ण केवल इस जीवन को लक्ष्य मान कर अपना जीवन जीता है | पृथ्वी पर हमारे जीवन की अवधि भले ही 100 साल क्यों न हो, पर वेह अनंत काल की तुलना में मात्र एक अंश है|

पवित्र शाश्त्र बतलाती है की एक दिन प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर के समक्ष अपने इस सांसारिक जीवन के हर पल का जवाब देना हगो | जब हम पृथ्वी पर जीये करोड़ों-अरबों व्येक्तियों के विषय में विचार करेंगें तो सोचने पर मजबूर हो जायेगें की परमेश्वर कैसे इतने सारें लोगों के जीवन के हर घटना ( किये, बोले और विचारे) का हिसाब रखता है |इसका हिसाब प्रत्येक मनुष्य की स्मृति /याददाश्त में दर्ज होता है |

एक व्यैक्ति की याददाश्त एक वीडियो टेप (video-tape) की तरह ईमानदारी से वेह सब कुछ अभिलेखित / दर्ज (records) कर लेती है जिसे वेह करता,बोलता वः सोचता है |न सिर्फ इतना यह याददाश्त हमारे अंदरूनी इरादों एवं भीतरी नजरिए को भी दर्ज कर लेती है | और एक व्यैक्ति की मौत हो जाने पर हालांकि पृथ्वी पर वह अपना शारीर तो त्याग देता है , परन्तु उसकी याददाश्त जो उसकी रूह का हिस्सा है उसके साथ ही रहते हुए मृत आत्माओं के स्थान पर पहुच जाती है |

उस दिन, अंतिम फैसले पर प्रतिएक व्यैक्ति जब बरी आयेगी, तो परमेश्वर मात्र उसके याददाश्त के वीडियो टेप (video-tape) को शुरू कर देंगें और उसके जीवन सम्पूर्ण कारनामा विश्व के सामने प्रदर्शित किया जयेगा | तब कोई भी व्यैक्ति प्रदर्शित वीडियो टेप (video-tape) की सटीकता पर सवाल नहीं उठाएगा क्यों स्वयं उसकी अपने (पृथ्वी पर बिताये जीवन) याददाश्त से ही प्रदर्शित हो रहा होगा |

आज शालीनता, पाखंडी धार्मिकता और दिखावे का जो लिबास हमने लोगों की बीच पहन रखा है उस दिन उतर जयेगा और हमारे भीतर के असली इंसान का उजागर होगा |उस दिन "धर्म" भी किसी को नहीं बचा पायेगा क्यों की यह साफ़ हो चूका होगा (हमारे याददाश्त वीडियो टेप के प्रदर्शित से) की हम सभी पापी है चाहे हम किसी भी धर्म को मानने वाले क्यों न हो | और भले ही हम किसी भी धार्मिक परिवार में जन्म क्यों न लिया हो या किसी भी धर्म के अनुयायी रहें | न सिर्फ इतना हमारे अच्छे (धम्रिक) कार्य , गरीबों में दान धर्म , धार्मिक स्थलों की यात्रा आदि भी हमें नहीं बचा पाएँगे क्यों की इनमें से कोई भी कार्य हमारे द्वारा किये गये पापों को मिटने का समर्थ नहीं रखती |

केवल एक ही उपाई है, जिससे परमेश्वर के समक्ष हमरे याददाश्त में दर्ज उन सरे चीज़े जिन्हें हमने करी,बोली एवं विचारी हो उसे उसे मिटाया जा सके , ताकि अंतिम न्याय के दिन उस वीडियो टेप के प्रदर्शित नो हो सके |याद रहें की हमारे अच्छे कार्य हमारे बुराई को नहीं मिटा सकते | हमारे पापों की उचित सजा दिया जाना ज़रूरी है | पवित्र शास्त्र बतलाती है की हमरे पाप ही उचित सजा है अनंत-काल का म्रुत्यु है | यह म्रुत्यु ही हमारे पापों की उचित सजा है |

इसी सज़ा से हमें बचने के लिए परमेश्वर का पुत्र प्रभु यीशु मसीह स्वर्ग से धरती पर उतर कर एक मानव रूप में जन्म लिया और 2010 साल पहले यरूशलेम के बाहर एक क्रॉस पर अपने प्राणों की बलि दी | वहां उन्होंने सम्पूर्ण मानव जाती के पापों के लिए निर्धारित / नियुक्त दिव्य सजा को भोगा - सारे मवाव जाती चाहें वेह किसी भी धर्म को माने वाले क्यों न हो | पास ही एक कब्र में दफनाये गया | लेकिन 3 दिन पश्चात वह मृतकों में से जीवित हो उठा ,और ऐसा कर उसने साबित किया की वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था |वह मृत्यु मानव जाती के महानतम शत्रु - मृत्यु पर विजय पा सकता है | 40 दिनों पश्चात, बहुत लोग के नज़रों के सामने स्वर्ग में उठाये गये ,इस वादे के साथ की अपने नियुक्त समय में वह इस धरती पर सर्व मानव जाती का न्याय करने पुनः वापस आयेगें | इस वादे को बीते 2010 वर्ष हो चुकें है उनके आगमन का समय निकट आ चिका है ,वह किसी भी दिन अपना वादा निभाने इस पृथ्वी पर आ सकतें है | मंनव जाती के इतिहास में केवल प्रभु यीशु मसीह ही ने सम्पूर्ण मानव जाती के पापों के लिया अपने प्राणों की बलि दी | और केवल वह ही अकेले ऐसा (व्यक्ति) है जो मृतकों में से पुनः जीवित हो उठे | यही दौनो बात उन्हें बिलकुल अनोखा बना देती है |

आज ,हमारे याददाश्त के वीडियो से हमारे पापों को मिटा कर उनकी साजों से मुक्ति/माफ़ी मिल सकती है , अगर हम सच्चे ह्रदय और इमानदारी से अपने पापों से मन-फिर (REPENT) कर अपने पापों से सच्ची पश्चाताप कर परमेश्वर से बिनती करें की वह हमारे पापों को प्रभु यीशु मसीहा के खातिर माफ़ कर दें , और विस्वास करें की प्रभु यीशु मसी हमारे की पापों के खातिर मारा गया और 3 दिन पश्चात मृतकों में से जीवित हो उठा |

न सिर्फ इतना | परमेश्वर इस से भी कुछ ज्यादा प्रदान करने को व्याकुल है | वेह यह वादा करतें है की "पवित्र आत्मा" के द्वारा हमारे ह्रदय मैं वास करने आयेंगे और यह "पवित्र आत्मा" हमें अपने बुरी (पापों) आदतों पर काबू पाने का समर्थ भी प्रदान करेगा | ताकि अंतिम न्याय के दिन हमारे याददाश्त (वीडियो टेप) का प्रसारण पवित्रता , अच्छाई और भलाई से भरा हुआ है |

परमेश्वर द्वारा मानव जाति के मुक्ति लिए नियुक्त किया गया एक मात्र मार्ग है ,याद रखिये आपके पास इसका विकल्प केवल एक ही है - और वह - अंतिम न्याय के दिन सम्पूर्ण विश्व के समक्ष अपने याददाश्त में दर्ज (वीडियो टेप) का प्रसारण का सामना करने हो तैयार रहें | सचाई को जाने और इसकी गंभीरता को समझे की अनन्त-काल के न्याय का दण्ड है आग की एक झील | इसलिए हमारा यह कर्त्तव्य बनता है की, प्रेम पूर्वक सब को इससे (अनन्त न्याय का दण्डः) बचने के एकमात्र मार्ग के विषय में चेतावनी दें |

7. इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना के आश्चर्यजनक तथ्य

प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और मृतकों में से उनका पुनः जीवित हो उठाना-यह दौनो तथ्य मवाव इतिहास के 2 सबसे महाव्तापूर्ण घटना एवं सत्य है | यह दौनो तथ्य ऐसे तथ्य है जिन पर ईसाई वीश्वास का केंद्रीय स्थापित है |

"कलवारी क्रूज़" पर प्रभु यीशु मसीह की हुई मृतु से हमें (4) स्पस्ट सत्य सिखाने की मिलतें है |

1.मृत्यु के बाद भी एक जीवन है

अगर यही जीवन सभ कुछ होता| तो प्रभु यीशु मसीह अपने प्राण कभी भी नहीं त्यागते | उनके पास अपार दिव्या शक्ति मौजूद थी और वेह बेहद आसानी से अपने आप को अपने दुश्मनों से बचा लेतें | क्रूज़ पर चढ़ाएं जाने के लिए उन्हें आपने आप को ख़ुशी से सौपने की कोई अवशता नहीं थी |

मृत्यु के बाद जीवन और अनाथ काल में रूह का तुरंत पहुँच जाने प्रभु यीशु मसीह के लिए इतना वास्तविक (सत्य) था इस बात की पुष्टि तब होती जब अपने बगल में लटके) उस चोर के कहा " आज तुम मेरे साथ स्वर्ग में होगे "

प्रभु यीशु मसीह के यह कथन बिलकुल ठीक साबित हुए जब 3 दिन पश्चात वह मृतकों में से पुनः जीवित हो उठे | यह घटना प्रभु यीशु मसीह के मृत्य एवं मृत्यु के बाद का जीवन के बारे में कहे वाक्य के स्पष्ट साबित करता है |

याद रखिये की आपके मौत के बाद भी एक जीवन है जो वर्त्तमान में आपके के इस जीवन से कहीं अधिक महवपूर्ण है |

2.परमेश्वर पवत्र है

प्रभु यीशु मसीह के मृत्यु से हमें दूसरा सबक यह मिलता है की परमेश्वर असीम एवं पूर्ण रूप से पवित्र है और वह किसी भी हालत में पाप को स्वीकार नहीं कर सकतें | क्रूज़ पर हम इस बात को स्पस्ट रूप के देखेगें जब प्रभु यीशु मसीह जो की पूर्ण रूप से निष्पाप थे जब उन्होंने सम्पूर्ण विश्व के पाप ka बौझ उठाया ,तब परमेश्वर को (न चाहते हुए भी ) प्रभु यीशु मसीह की ओर से अपने मुह मोड़तें उन्हें त्यागना पड़ा क्यों की वेह पाप को किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं कर सकतें थे | पवत्र शतर बतलाती है की "परमेश्वर इतने पाख एवं शुद्ध है वेह पाप की ओर देख भी नहीं सकतें" इसिलिय जब प्रभु यीशु मसीह क्रूज़ पर सम्पूर्ण विश्व के पाप का बौझ उठाए हुए थे तब परमेश्वर के न्याय उनके एकलौते पुत्र पर प्रकट हुआ | अपने पुत्र के प्रति अपार प्रेम भी पाप को उन्धेखा नहीं कर पाया | यह परमेश्वर का पाप के प्रति उनकी गंभीरता को दर्शाता है | निश्चित रूप से परमेश्वर आप से अपार प्रेम करतें है ,परन्तु अगर वह आप में पाप पायेगे तो ठीक वैसा ही करेंगे जैसा उन्होंने क्रूज़ प्रभु येशु मसिः के साथ किया था बहुत लोगों की यह गलत धरना है ,क्यों की परमेश्वर उनसे बहुत प्यार करतें है तो निश्चित रूप से वह उनके पाप को उन्धेखा कर देंगें, परन्तु वह एक बात को भूल रहें है "के पाप आखिर एक पाप होता है " भले वेह किसी में न क्यों पाया जाये |

परमेश्वर (का तेज़) एक भस्म करने वाली अग्नि है , जिनके जीवान मैं पाप है उन्हें यह अग्नि भस्म कर देगी | दूसरों की नज़रों में भले ही हम अपने आप को अच्छा य बेहतर मानतें हो परन्तु यह बात कोई मान्यता नहीं जब हम पवित्र आत्मा के समक्ष अपने जीवन का हिसाब देने के लिया खड़े होंगें पाप कुष्ठ रोग और कैंसर से भी ज्यादा खतरनाक है | यह हमारे अनंत काल को नष्ट कर सकती है |

3.ईश्वर प्रेम है

प्रभु यीशु मसीह के मृत्यु से तीसरा सबक हमें मिलता है की परमेश्वर को असीम एवं अपार प्रेम से पूर्ण है | परमेश्वर का प्रेम उनके द्वारा कहें शब्दों और हम पर दिखये गये दाया मात्र से नहीं प्रकट होता ,बल्कि उनका अपार प्रेम इस बात से साबित होता है की उन्होंने अपना एकलौता और अपना प्यारा पुत्र येसु को हमें दिए ताकि वह हमारे पाप के बलि स्वरुप क्रूज़ पर चढ़ाया जाये और हमें अपने पापी एवं दुखी जीवन से मुक्ति दिला सकें | प्यार के प्रति पूरे विश्व में इससे बड़ा साबुत हमें नहीं मिल सकता की एक व्यैक्ति दूसरों व्यैक्ति के पापों के लिया स्वयं अपनी जान दें |

प्रभु यीशु मसीह ने क्रूज़ पर इन सारे पीडाओं, तिरस्कार और दर्द को सहा ,सिर्फ इसलिए क्यों की वेह हम से अपार प्रेम करतें थे और हमे इस पाप के सजा से बचाना चाहतें थे | उन्होंने शारीरिक , मानसिक एवं भावनात्मक रूप से इन दर्द को सहा, सर्वोपरी उन्होंने आध्यात्मिक रूप से इस कष्ट को सहा जब उनके (स्वर्गीय) पिता ने उन्हें त्याग दिया |

क्रूज़ पर परमेश्वर का प्रभु यीशु मसीह द्वारा उठाये पीड़ा / दर्द केवल एक बात को साबित करता है की वेह हम से कितना प्रेम करतें है और हमरे प्रति उनके लिया कितना मान है | इस विश्व में एक व्यैक्ति का कोई मूल्य नहीं ,अगर आप एक व्यैक्ति का सही मूल्य जानना चाहतें है तो क्रूज़ पर अपना ध्यान आकर्षित किजीयें , आप पायेगें की परमेश्वर ने नज़रों में हम इतने बेशकीमती है की उन्होंने हमारे खातिर अपना एकलौता /प्यारा पुत्र दे दिया |

पवित्र शास्त्र , हमारे प्रति परमेश्वर के प्यार की तुलना अपने बच्चे के प्रति उस माँ के प्यार से की गयी है | किस प्रकार एक माँ अपने बच्चे पर छाई बिमारी को अपने ऊपर लेने के लिए व्याकुल होती है ताकि उस बिमारी से अपने बच्चे को मुक्त करा सके | ठीक उसी प्रकार परमेश्वर ने मानव जाती के पाप को अपने ऊपर लेलिया ताकि हमें अपने पापों से मुक्ति/ छुटकारा मिल सकें |

परमेशवर के सम्पूर्ण पवित्रता एवं असीम प्रेम का मिलन हमें क्रूज़ पर देखने को मिलता है | संपूर्ण पवित्रता मानव से उसकी पापों के लिया सजाए मौत की मांग करती है - पापों द्वारा अनाथ काल का मौत | पूर्ण प्रेम उस सजा को अपने ऊपर ले लेता है और हमें इस से मुक्ति दिलाता है |

4.उद्धार का कोई अन्य मार्ग है

प्रभु यीशु मसीह के मृत्यु से चोथा सत्य स्पस्ट रूप से यह प्रकट होता है की मुक्ति /मोक्ष को कोई दूसरा मार्ग नहीं है |

मुक्ति का कोई अन्य रास्ता / मार्ग मौजूद होता तो परमेश्वर उस चुन लेतें , और किसी भी हालत में अपने एकलौते / प्यारे पुत्र को मरने की अनुमति नहीं देतें | अगर पृथ्वी पर एक धार्मिक/अच्छा जीवन जीने से हमे स्वर्ग नसीब होता और हम परमेश्वर के समक्ष खड़े हो जाते ,तो परमेश्वर इतना मुर्ख एवं निर्दयी नहीं की अपने एकलौते /प्यारे पुत्र को बिना किसी वजह क्रूज़ पर इतने सरे पीड़ा /तिरस्कार एवं दर्द उठाने की अनुमति नहीं देतें|

हमारा विवेक / बुद्धि परमेश्वर से अधिक नहीं है | अनंत बुद्धि केवल एक ही बात पर विचार करती के किस प्रकार मानव जाती को अनंत पवित्रता और न्याय की मांग में किसी किसी भी प्रकार सम्खोता किये बिना हमें बचाया जा सके | भले ही इसके लिए कितनी ही पीड़ा क्यों न उठानी पड़े | अनंत प्रेम ,हमारी मुक्ति के लिए किसी भी मार्ग पर चलने को तैयार था |

अगर आप सोचतें है की उधर/मुक्ति का कोई ओर मार्ग उपलभध है तो आप अपने आप को परमेश्वर से भी ज्यादा बुद्धिमान समझ रहें है, और सोंच संकेत करती है की आप कितने मुर्ख है |

क्या हमें क्रूज़ पर प्रभु येसु मसीह की मृत्यु से कुछ सीख मिली है ? अगर आपका जवाब हाँ है तो उस अपार प्रेम के उत्तर में हमारी एक मात्र प्रतिक्रिया यह होने चाहिए की हम अपना सम्पूर्ण जीवन अनंत काल तक प्रभु येसु मसीह को समर्पित कर दें | इस सत्य के प्रति केवल बौद्धिक ज्ञान एवं समझ होना ही काफी नहीं | परमेश्वर को हमारे इच्छाशक्ति में हुई प्रतिक्रिया की तलाश है |

8. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य

हम सभी रेगिस्तान में यात्रा कर रहें यात्री सामान है, जो प्यास से मर रहें है , अगर इसी बीच किसी को पानी मिल जाये तो वह निश्चित रूप से इसके बारे में अन्य यात्रियों क़ो सूचित करेगा | परन्तु वेह किसी को पानी पिने पर बाध्य नहीं कर सकेगा |

विश्व का सबसे आश्चर्यजनक सत्य यह है की , दुनिया का सबसे तुत्छ पप्पी भी (क्षमा पाकर) परमेश्वर के पुत्र होने का सौभाग्य प्राप्त कर सकता है |और यह सब एक ही पल में संभव है अगर वह सच्चे एवं पूर्ण ह्रदय और इमानदारी स परमेश्वर को खोजे |

रहा चलतें अगर आप 50 पैसे का सिक्का खो दें तो आप उस सिक्के को खोजने के लिए कितना वख्त कर्च करेंगें ? शायद 1 मिनट भी नहीं - ठीक कहा न ? मान लिगिये अगर आप 1000 रुपयें से भरा एक बक्सा घुमा दे, तो आप उसे तब तक खोजोगें जब तक उसे आप उसे पा नहीं लेतें | कई लोग परमेश्वर को उसी ढंग से खोजतें है जिस तरह वह उस 50 पैसे के सिक्के को खोज रहें हो , और इस में कोई भी संदेह नहीं की उन्हें (जीवन भर) परमेश्वर नहीं मिलतें | परमेश्वर की कीमत किसी भी वास्तु या चीज़ से अधिक उन हज़ार रुपयों के बक्सों से कहीं ज्यादा |

परमेश्वर को मावन यंत्र / रोबोट (ROBOTS) की अवशाकता नहीं (जो पूर्व निर्धारित रीति से चलतें हो) उनसे तालाश है पुत्र एवं संतानों की | इसीलिए उन्होंने हमें निर्णय लेने का स्वतन्त्र स्वेच्छाबलि (FREEWILL) प्रदान किया है , जिसकी सहायता से हम या तो परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन कर सकतें है या तो उन की अवज्ञा |पाप ने न सिर्फ हमें बल्कि हमारे परिवार को भी बर्बाद /नष्ट करने में कामियाब रहा , पाप हमारे जीवन को बत्तर बना देता है और अंत में यह हमें अनंत काल के लिए नरक भिजवाने में कामियाब हो जाती है |

लेकिन परमेश्वर आज हमें मन-फिराव (REPENT) कर पश्चाताप करने का निमंत्रण देता है , (मनफिराव = अपने पाप एवं पापी रास्तों से परमेश्वर तो दिशा में अपने मन को मौड़ ने को ही मन फिरना कहतें है ) ऐसा करने से हमारे जीवन के सारें पापों से प्रभु येशु मसीह की मृतु के द्वारा पूर्ण मुक्त और क्षमा मिल सके |

परमेश्वर आपको ऐसा करने पर मजबूर सकते है | जब कभी भी हम पाप करें तो वह हमें किसी त्रुटी / हानि , रूगों एवं बिमारी से दंडित कर के हमें तब तक बाध्य कर तें जब तक हम हम उनकी आज्ञाओं का पालन न कर लेतें |पर ऐसा करने से हम मात्र एक रोबोट या एक बंधुवा दास बन कर रह जातें - उनके पुत्र या संतान नहीं बनते| इसलिए उन्होंने हमें मजबूर नहीं किया | प्रेम पूर्वक परमेश्वर पिता हमारा इंतज़ार करतें है की कब हम स्वेइच्छा से अपने पाप का मार्क त्याग कर उनकी ओर पलटें

आप अभी वह निर्णय लीजिये, आप एक पल में परम्व्श्वर के पुत्र होने का सौभग्य प्राप्त कर सकतें है | आप को अंदेशा नहीं ,परन्तु यह बात जीवन और मृत्यु की है | |

तो क्यों न हम परमेश्वर के समक्ष इस प्रार्थना को करें

"प्रभु यीशु मसीह,में स्वीकारता हूँ की मैं एक पापी हूँ और दंड के योग्य हूँ | मेरे पापों के लिए सज़ा उठाने और पापों के लिए मरने के लिए धन्यवाद , और मृतकों में से पुनः जीवित हो उठाने के लिए| वास्तव में अपने जीवन से पाप के मार्ग क़ो त्याग देना चाहता हूँ |प्रभु यीशु मेरे ह्रदय में आएये और आज से एक नई जिंदगी की शुरुआत करने में मेरी मदत किजीयें | मुझे अपनी शक्ति और समर्थ प्रदान करें ताकि मैं अपने जीवन के बचे दिनों में आपके सम्मान कर सकूँ | प्रार्थना सुनने केलिए धन्यवाद|

यह फैसलों आपके जीवन में लिए सभी फैसलों में के सबसे महत्वपूर्ण होगा |

परमेश्वर बहुतायत से आपको आशीषित करे |

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